
निराशा के तिमिर को दूर भगाना है,
हृदय में आशा का एक दीप जलाना है।
माना कि राहों में अंधकार बहुत है,
पर छोटे से दीए का साहस अद्भुत है।
बीत गया जो कल, उसे भूल जाना है,
सुबह की अरुणिमा पर मुस्कुराना है।
दुखों के कुहासे को चीर कर आगे बढ़ना है,
अब निराशा से नहीं, उम्मीदों से लड़ना है।
ये दीप केवल मिट्टी का आकार नहीं,
यह हार मान चुके मन का त्योहार नहीं।
यह तो प्रतीक है उस अटूट विश्वास का,
अंधेरे को चीरते, नई भोर के प्रकाश का।
सजाओ आंगन, मिटाओ दिलों की दूरियां,
आदित्य अब न रोक पाएँगी कोई मजबूरियां।
हर घर में आज खुशियों का डेरा होगा,
इस दीपावली, मन में आशा का सवेरा होगा।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













