
था इक कमरा भरा पूरा,जिसमे था परिवार बुना,
इक इक मोती जोड़ तोड़कर, बनाया था कुनबा नवां।
हर कोई उसको लगा सींचने बहाकर अपना पसीना जवां,
बूँद बूँद से,लगा जब भरने सागर का सा संसार नया।।
फिर उगे पंख पंछियों के ,चुगने लगे दाना,नया,
स्वाद किसी का कोई कैसा,किसी का स्वाद बना रवैय्या ।।
कोई तो उड़ कर पार चला गया, फांद आसमान लांघ सदा,
कोई इत उत रहा ताकता फर्श था लगने लगा सजा।।
घर की छत,किवाड बोलते कहते पंछी कहा गया,
धीरे धीरे ख़ामोशी छा गई, रहता था शोर जहा भैया।।
फिर इक दिन रह गया अकेला,जो था जब शुरुआत भैया,
घर की दिवार रही ताकती तन्हा विरह जिसकी सदा।।
शोर बहुत करती है अब ये,ख़ामोशी की सी जिसकी सजा,
होना ही था गर शुन्य जो,फिर लगाया ही था क्यू दाम भला।।
संदीप शर्मा सरल













