
सबकी प्रशंसा उदारता से करता हूँ,
यह न केवल तारीफ प्राप्तकर्ता की
मनोदशा को प्रोत्साहित करता है,
मेरी मनोदशा को भी ऊर्जा देता है।
मैंने अपनी शर्ट की क्रीज या धब्बे
देख परेशान होना बंद कर दिया है,
मेरा मानना है कि दिखावे की अपेक्षा
व्यक्तित्व ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
आख़िरकार मैं उन लोगों से अब दूर
ही रहता हूँ जो मुझे महत्व नहीं देते,
मैं यह भली भाँति बखूबी जानता हूँ
कि वो मेरी कीमत नहीं पहचानते।
मैं तब शांत रहता हूँ जब कोई मुझे
चूहे की दौड़ से बाहर निकालने के
लिए चूहों सी राजनीति करता है,
मैं चूहों की दौड़ में शामिल नहीं हूँ।
अब तो मैं अपनी भावनाओं से
शर्मिंदा नहीं होना सीख रहा हूं,
आखिरकार जो मानव बनाती हैं,
मुझे वो भावनायें अब मैं जी रहा हूँ।
मैंने सीखा है रिश्तों को तोड़ने से
अहंकार को छोड़ देना बेहतर है,
अहंकार मुझे सबसे अलग रखेगा,
स्नेह अनुराग सबको साथ रखेगा।
वही करता हूं जो मुझे खुशी देता है,
आखिर अपनी खुशी का जिम्मेदार हूँ,
आदित्य सारी दुनियादारी छोड़ चुका,
क्योंकि मैं उस ख़ुशी का हक़दार हूँ।
डा० कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ












