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केनोपनिषद्- द्वितीय खंड श्लोक ५

सम्बन्ध– अब उस ब्रह्म तत्वको इसी जन्म में जान लेना अत्यंत आवश्यक है, यह बतलाकर इस प्रकरण का उपसंहार किया जाता है—

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती ।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीरा: प्रेत्यास्यमाल्लोकादमृता भवन्ति ।।

व्याख्या— मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ है; इस प्रकार जो मनुष्य परमात्मा की प्राप्ति के साधन में तत्परता के साथ नहीं लग जाता, वह बहुत बड़ी भूल करता है । अतएव श्रुति कहती है कि जब तक यह दुर्लभ मानव शरीर ही विद्यमान है, भगवत, कृपासे प्राप्त साधन-सामग्री उपलब्ध है, तभी तक शीघ्र से शीघ्र परमात्मा को जान लिया जाए तो यह सब प्रकार से कुशल है—
मानव जन्म की सार्थकता है । संसार की त्रिविध तापों और विविध शूलोंसे बचने का यही एक परम साधन है कि जीव मानव जन्म में दक्षता के साथ साधन-परायण होकर अपने जीवन को सदा के लिए सार्थक कर ले । मनुष्य जन्म के सिवा जितनी भी योनियाँ हैं, सभी केवल कर्मों के फल भोगने के लिए ही मिलती हैं । उनमें जीव परमात्मा को प्राप्त करने का कोई साधन नहीं कर सकता । बुद्धिमान पुरुष इस बात को समझ लेते हैं और इसी से भी प्रत्येक जाति के प्रत्येक प्राणी में परमात्मा का साक्षात्कार करते हुए सदा के लिए जन्म मृत्यु चक्र से छूटकर अमर हो जाते हैं ।।
केनोपनिषद्
द्वितीय खंड समाप्त
साभार— गीता प्रेस
लेखन एवं प्रेषण—
पं. बलराम शुक्ल
नवोदय नगर, हरिद्वार

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