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जानकी अष्टकम।।

शुक्ल पक्ष के वैशाख महीने,नौमी तिथि जब थी तब आई,
प्रकट भई थी,जनक दुलारी, पुष्य नक्षत्र मंगल दिन भाई ,
छत्तीस के छत्तीस गुण मिलते, तभी तो राम संग सिय वरी जाई।।
को नही जानत, हे जग मे सिय,( तेरी महिमा री महामाई।। ) -2

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जनक दुलारी रही थी जानकी जो, पिनाक
शिव धनुष थी उठाई,
धरती से प्रगट रही सिय ही तो, सीता सीत से नाम थी पाई।
भक्ति, शक्ति , आसक्ति की वाहिता राम संग जुड़ी, सिय राम कहाई।।
को नही जानत हे जग मे सिय, ( तेरी महिमा री महामाई ।।) -2

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थी जब जनकपुरी जानकी तो,ज्ञान अनुराग की थी महामाई,
गुण नारी के श्रेष्ठ लिए थी,बुद्धि सिद्धि कौशल करूणाई,
मिथिला की मैथिली थी जननी, सो ही तो वह मैथिली कहाई।।
को नही जानत हे जग मे सिय, ( तेरी महिमा री महामाई।। ) – 2

              ===4===

जीवन था तपस्या सा जीम्हा, लक्ष्मी थी अवतार कहाई,
आई विपद जब राम गमन वन ,सीता थी लिए आप अपनाई,,
धर्म कर्म न था कभी छोड़ा,थी तभी मूर्त त्याग कहाई।।
को नही जानत हे जग मे सिय, ( तेरी महिमा री महामाई।। ) -2

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हरण लंकापति वन से कीन्हा था , थी रही वह तब भी धर्म निभाई,
खाली न जाए साधु कुटिया से,लांघ थी लकीर वह दुनियाँ बनाई ,
धर्म सर्वोच्च रखा सिय माँ ने,जब भी थी घड़ी परीक्षा की आई।।
को नही जानत हे जग मे सिय, ( तेरी महिमा री महामाई।। ) -2

            ===6===

जब जब पीर पड़ी सिय पर थी,तब तब देव गुहार लगाई,
अग्नि परीक्षा,चाहे कोई भिक्षा, दीक्षा की थी वह ऐसी कमाई,
त्याग तपस्या मूल जीवन का,थी रही सीख वह आप सिखाई।।
को नही जानत हे जग मे सिय ( तेरी महिमा, री महामाई ) -2

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पंचवटी हो या अशोक वाटिका, आश्रम बाल्मिकी या रघुराई,
राम सिय की,सिय रही राम की ,कथा कही हर थाह सुनाई
कैसी अनुपम कथा गढी थी,जो लिखी लेख विधाता बनाई।।
को नही जानत हे जग मे सिय, ( तेरी महिमा री महामाई।। )-2

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शुभ संयोग,या पति वियोग, कैसे लेख रचे रघुराई,
धर्म न छोड़ा, कर्म मुख न मोड़ा, विपदा चाहे कैसी चली आई ,,
स्थापित किए चरित्र सिया ने,तभी तो सीता माँ वह कहलाई।।
को नही जानत हे जग मे सिय, ( तेरी महिमा री महामाई।। ) -2
मौलिक रचनाकार ,
संदीप शर्मा सरल
देवभूमि, देहरादून उत्तराखंड

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