
काले काले बादल आओ,झम-झम पानी बरसाओ।
सूर्य ताप से मन व्याकुल है,और अधिक मत तरसाओ।
आकर किधर लुप्त हो जाते ,धरती है अतिशय प्यासी।
कोलाहल है मचा चतुर्दिक,तड़प रहे हैं थलवासी।।
उमड़-घुमड़ कर बादल आये,मन मयूर हरषाये हैं।
काले मेघा पानी दे दो, जीव जन्तु अकुलाये हैं।
बरस रहीं हैं जल की बूँदे ,कोयल कूकू कर बोले।
तरस रहें हैं मेरे नैंना,प्रियतम घर आ रस घोले।।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर,बिहार











