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देव भूमि की छटा निराली

नील बितानों में लिपटी घाटी
स्वपन सा मोहित हर रजकण
जहाँ अरण्य नहीं बस वन हैं,
जिनमें बसते परम ब्रह्म।

गगन से करते जो बातें
चीड़ वृक्ष अबाध खड़े
जैसे ऋषि ध्यान मग्न हो
मौन में वेदों को गढ़े ।

देवदारों की शाखाएँ भी
अर्घ्य सी नभ को अर्पित हैं,
वृक्ष  और सकल वनस्पति
ईश प्रार्थना में समर्पित है।।

नदियां कल कल गीत सुनातीं
शिव चरणों को धोती जातीं,
कभी चंचला कभी मौन सी
जैसे उमा ध्यान लगाती।।

शुभ्र हिमालय की गोदी में
सपनों का फैला आलोक,
यहां प्रभावी शरणागत सी
हर छाया का भी रस -शोक।।

हवा नहीं चलती चलती है
कथा किसी उपासक की
जिनकी तपस्या होती हैं
ईश्वर के सुंदर साधक की।।

यह भूमि नहीं यह धरती है
तप प्रेम और शुचिता का घर
जहां सदा पर्वत गाते हैं
“तुम हो आत्मा के पथ पर”।

भाव बिंब स्वर लय गति सबमें,
कोई जानी अंजानी
जिसे हृदय कहता है बार-बार
देवभूमि की छटा निराली।।

स्वरचित पुष्पा पाठक
छतरपुर मध्य प्रदेश

पुष्पा पाठक, छतरपुर (म.प्र.)

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