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आषाढ़ का पहला दिनहे !


मेघ क्या तुम फिर से
दूत बन कर जाओगे?
वहां जहां हादसा हो गया
बरसाओगे कुछ जल,
तुम भी बरसाना कुछ
अश्रु जल ताकि
तुम्हारी शीतल फुहार से
हो सके कुछ ठंडक
उन संतप्त दिलों को
जहां सब कुछ नष्ट हो गया है।
शीतल कर दो उस जगह को
बरसाओ खूब जल
कुछ तो राहत मिलेगी
उस धरती माता को
उस तप्त धरा को
जो रो रही है जार जार
विलखरही है उनकी स्मृति में
जो अचानक से चले गए
अपने सभी ख्वाबों को
यहां पर बिखेर कर
ऊंचे सपने जो लेकर आए
उड़े थे वह सब जल गए हैं
उन्हीं के साथ ।
उन्हें जाकर कुछ शीतलता पहुंचा दो
मेरा इतना काम कर दो
मेरा इतना तो काम कर दो
नहीं हूं मैं कालिदास
जो मैं भेज सकता प्रेयसी के पास
जाकर तुम बताते सुनाते दिल का हाल
हे मेघदूत तुम जाओ और
संतृप्त कर दो उस धरा को
जो हरी नहीं है
जो सूखी है
आषाढ़ के प्रथम बादल
सुनो सबकी पुकार
इस बार बार बरसो
बहुत जोरदार बहुत
जोरदार बहुत जोरदार।।

पुष्पा पाठक छतरपुर

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