
स्मृतियों के झरोखों से जो देखी
मां मुझे तुम बहुत याद आई
मुझे आज भी तुम्हारी याद बहुत
सताती है
वह मेरे लिए लजीज लंच बनाना
वाटर बोतल देना तो कभी भूलती नहीं
मेरे लौटने का इंतजार बेसब्री से किया करती
कभी अंदर जाती कभी बाहर आती
बहुत परेशान हो जाया करती
मेरे आने पर बस्ता मुझसे लेकर
खुद लेकर रखना
आंखों में आंसू लिए जब वापस आती
तब मां तुम गोदी में ले खूब पुकारती
बिन बात के मैं रोया करती, दूध ना पीती
मां मुझे झट उठा लेती ,दूध न पीने का हजार बहाने बनाती
खूब दुलार कर तुम दूध पिलाती
मां सब कुछ है पर तुम्हारी बात ही कुछ और है
सारी दुनियां की खुशी तुम ही में है समाई
तेरे बगैर दुनिया लगती है सूनी
तुम मेरे लिए जन्नत का फूल हो
मां आज तेरी याद बहुत सता रही है
आ जाओ मां! मुझे छोड़कर क्यों चली गई
अब मैं कभी तंग नहीं करूंगी
तुम्हारी स्मृतियां ही हमारे जीने का सहारा है
डॉ मीना कुमारी परिहार













