Uncategorized
Trending

षोडश संस्कारों की आवश्यकता

संस्कार – कार्य के अधिकारी– अधिकार अनुसार कर्म करने की सम्यक फल की प्राप्ति होती है । संस्कार कर्म में भी किसका अधिकार है, इसे समझना आवश्यक है । महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा है—

ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रा वर्णास्त्वाद्यास्त्रयो द्विजा: ।
निषेकादिश्मशानान्तास्तेषां मन्त्रतः क्रिया: ।।
{याज्ञवल्क्य स्मृति:१०}

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इसमें प्रथम तीन वर्ण द्विज कहलाते हैं । गर्भाधान से लेकर मृत्यु पर्यंत इनकी समस्त क्रियाएं वैदिक मंत्रों के द्वारा होती हैं ।’ उपनयन आदि संस्कारों को छोड़कर शेष संस्कार शुद्र वर्ण बिना मंत्र के करे ।।
यमसंहिता में कहा गया है—
‘शूद्रोऽप्येवंविधः कार्यो विना मन्त्रेण संस्कृतः ।’

महर्षि व्यास द्वारा गर्भाधान से कर्णवेध तक जो नौ संस्कार कह गए हैं, उनमें स्त्रियों के संस्कार आमंत्रक करने की अनुमति देते हैं, परंतु विवाह संस्कार के लिए समंत्रकका विधान बदलते हैं । शुद्रके ये दसों संस्कार बिना मंत्र के ही संपादित होते हैं । जैसा कि उन्होंने कहा है—
नवैता: कर्णवेधान्ता मन्त्रवर्जं क्रिया: स्त्रिया: ।
विवाहो मन्त्रतस्तस्या: शूद्रस्यामन्त्रतो दश ।।
{व्यासस्मृति १।१५-१६}
आचार्य याज्ञवल्क्य का कथन है कि स्त्रियों के नौ संस्कार आमंत्रक ही संपन्न कराए जाते हैं, किंतु विवाह मंत्र के साथ संपन्न करना चाहिए–
‘तूष्णीमेता: क्रिया: स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः ।’
अपनी अपनी वेद शाखा के अनुसार संस्कार करना चाहिए—
‘स्वे-स्वे गृहे यथा प्रोक्तास्था संस्कृतियोऽखिला: ।’
इसी बात को महानिर्वाणतंत्र में दूसरे शब्दों में भगवान् सदाशिव देवी पार्वती को बतलाते हुए कहते हैं कि, संस्कार की बिना शरीर शुद्ध नहीं होता और अशुद्ध व्यक्ति देवताओं एवं पितरो {हव्य एवं कव्य}- के कार्यों को करने का अधिकारी नहीं होता है ।
अतः लोक परलोक में कल्याण की इच्छा रखने वाले विप्र आदि वर्णों को अपने-अपने वर्ण के अनुसार अत्यंत प्रयत्न पूर्वक संस्कार कर्मका संपादन करना चाहिए । यथा—
संस्कारेण विना देवि देहशुद्धिर्न जायते ।
नासंस्कृतोऽधिकारी स्याद्दैवै पैत्र्ये च कर्मणि ।।
अतो विप्रादिभिर्वर्णै: स्वस्ववर्णोक्तसंस्क्रिया ।
कर्तव्या सर्वथा यत्नैरिहामुत्र हितेप्सुभि: ।।
अतः संस्कारों को संपन्न करना नितांत अपेक्षित है । इससे शारीरिक एवं मानसिक मलों का अपाकरण होता है तथा आध्यात्मिक पूर्णता की प्रति सहज होती है जो मानव जीवन का चरण लक्ष्य है ।।

साभार— गीता प्रेस गोरखपुर
लेखन एवं प्रेषण—
पं. बलराम शरण शुक्ल
नवोदय नगर, हरिद्वार

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *