
गरजते बादल मूसलाधार बारिश,
ज्यों सब्र खो चुका आसमान।
हर बूंद छत पर हथौड़े सी गिरी,
कांप उठा पुराना मकान।।
भीतर से जर्जर बाहर से थका सा,
मौसम की मार से खुद को बचाता,
कांपती दीवारें , रिसती हुई छत,
अस्तित्व की लड़ाई लड़ता हुआ सा।।
घर के भीगते कोने सी,
भीगती रही उसकी आँखें,
दरकती हुई दीवारों ने ,
तोड़ दिए सारे सपने।।
आखिर मौसम की मार ने,
पुराने घर को ढहा दिया।
सपने ,यादें, जीने का हौसला,
सब मलबे में दब कर रह गया।।
डॉ. दीप्ति खरे
मंडला(मध्य प्रदेश)













