
राख बन जाने को लेकर, नफ़रतों के ढोए बोझ,
अहम अपने ऊंचे रखे,दिखते रखते बैर हर रोज।।
कितना था आसान असल मे ,सरल सरस सा बन जाना,
भुला दिया,अपनापन अपना,रखा तो गैर अपनाना।।
भले लगे वो लोग सब जो, थे कतार दूजी खड़े,
अपने वाली भीड़ मे,लगे तो लगे दूजे बड़े।
फ़ासला रखा आप ही,सोच कर, अपनी ही बात,
असल तो असलियत न थी,जानता भी तो कौन बाद।।
सब बुनी थी,आप ही,अपनी कमाई सोच थी ,
दोष देते, रहे दिखते,कैसी मेरी पोटली।।
होता है सरल,ये अक्सर, बीत दिन जाने के बाद,
याद आती है सुबह जो,आई दिन बिताने के बाद।।
लगता तुम्हे भी सच यही,जो सरल सरस से कह रहा,
या तजुर्बा, ज़िंदगी का,इतर तुम्हारा है रहा,।।
संदीप शर्मा सरल
देहरादून उत्तराखंड











