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गीत – कान्हा की दासी

कृष्णा प्रीत ऐसी लगी,
कृष्णा, कृष्णा करे, आत्मा मेरी।
कान्हा मैं तेरे रंग में रंग गई,
ओ कान्हा मैं तेरी दासी बन गई।
फिदा हूँ जो कृष्णा पे,
आशियाना बना लूँ कृष्णा का,
कृष्ण धुन गा रही।
मर मिट गई, तेरे नैनों पे,
कृष्णा तेरी बांसुरी से संवर गई।
कान्हा तेरे रंग में मैं रंग गई,
तेरी दासी मैं बन गई।
ओ कान्हा तेरी दासी बन गई।
तेरे नैनों पर यूं मर गई,
तेरी बांसुरी की धुन में यूं सँवर गई,
कान्हा तेरे रंग में, मैं यू रंग गई,
तेरे नाम से मैं सजती,
अपने आपको संवारने लगी।
कान्हा मैं तेरे रंग में रंग गई,
ओ कान्हा मैं तेरी दासी बन गई…. ।
आशियाना बना लूं वृंदावन में,
मैं तो गोकुल में बस जाऊँगी,
तन से हूँ मैं मन से तेरी हो गई,
तन से हूँ मैं हृदय में तेरी छवि उतर गई।
कान्हा मैं तेरे रंग में रंग गई,
ओ कान्हा मैं तेरी दासी बन गई … ।
ओ कान्हा सुना दे,
अपनी बांसुरी की धुन..
मैं इस दुनिया की धुन से
विरक्त हो गई।
दिखा दे एक झलक तेरी,
मैं इस दुनिया की धूप से
नेत्रहीन हो गई।
तन मन में बसी तेरी परछाई,
कान्हा तेरी एक झलक को मैं तेरी तरस गई।
कान्हा मैं तेरे रंग में रंग गई,
ओ कान्हा मैं तेरी दासी बन गई…।
जब तेरी प्रीत हृदय से लगी,
देख मैं कहाँ चली आई,
यह दुनियाँ हो गई पराई।
छोड़ आई अपने आशियाने,
भटक रही हूँ दर-दर,
अब तो आशियाना देखा ना
तेरे चरणों में।
दुनिया शत्रु बन गई,
जब निकली तेरी राह में
अब तो आशियाना दे तेरे चरणों में।
कान्हा मैं तेरे रंग में रंग गई,
ओ कान्हा मैं तेरी दासी बन गई….. ।

कविता चौधरी (राजस्थान )

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