
माँ सीता के जन्म से संबंधित।
माता सीता के जन्म से संबंधित मुख्यतः तीन कथाएं प्रचलित है।आइए इनके बारे मे एक एक कर नज़र डाले।
पहली कथा।
(बाल्मिकी रामायण से।)
जो विशेष प्रचलित है।।
कहते है कि एक बार जनकपुरी मे भयंकर अकाल पड़ा वहा के जन समुदाय मे हाहाकार मच गया हालांकि प्रजा प्रिय राजा जनक अपने राजसी खजाने से प्रजा के हित को हर संभव प्रयास कर उनकी मदद को दान पुण्य कर्म कर रहे थे।पर जन धन फसल व गौ धन के साथ-साथ पर्यावरण को काफ़ी कठिन दौर से गुजरना पड रहा था।तो ऐसे मे ऋषिगण की आस्था,अनुरोध व आज्ञा थी कि राजा जनक जनकपुर के खेत खलिहान मे स्वयं हल जोते तो इस आपदा से मुक्ति मिल सकती है इसीलिए इसी अनुष्ठान को फलीभूत करते हुए वे वहा की धरती को हल से जोत रहे थे कि जोतते समय उनके हल का अग्र भाग जिसे सीत कहते है से धरती मे एक जगह जा टकराया व जब उस स्थान को खोद कर देखा गया तो वहा एक कलश मिला जिसमे कि एक बालिका थी।राजा जनक ने जब उसे गोद मे लिया तो वात्सल्य उमड पड़ा व राजा जनक ने उसे अपनी पुत्री रूप मे स्वीकार किया।
और नाम करण की बात आई तो सीत से उपजने के कारण, नाम सीता रखा गया।
दूसरी कथा:-
यह कथा ब्रह्मवैवर्तपुराण मे मिलती है।
कहते है कि वेदवती नाम की एक स्त्री थी जो भगवान विष्णु की परम भक्त थी,और उन्हे (यानि भगवान विष्णु को )पति रूप मे पाना चाहती थी।इसी के लिए वह कठोर तपस्या कर रही थी।जब वह तपस्या रत थी तो रावण उधर से गुजरा रावण की नज़र उस तपस्या करती वेदवती के अनुपम दिव्य सौंदर्य पर पड़ी तो उसके रूप सौंदर्य से वह आकर्षित हो गया और मोहित होने के कारण बलात् उसे पाने की लालसा मे उसने उसे स्पर्श करना चाहा।जैसे ही वह आगे बढा तो वेदवती ने उसे श्राप दिया और कहा कि वह आज के बाद जिस भी स्त्री से बलात संबंध स्थापित करना चाहेंगा उसके अपने ही सिर के टुकड़े टुकड़े हो जाएगे,और यह भी कहा कि वह अपने योग बल से देह त्याग करती है और यह श्राप भी देती है कि वह उसकी पुत्री रूप मे जन्म लेकर आएगी और उसका सर्वनाश करेगी।
और तीसरी कथा इसी श्राप व बात को पुष्ट करती है।
तीसरी कथा।
जिसका विवरण अद्भुत रामायण मे मिलता है।
कहते है कि गृत्समद नामक एक महाऋषि थे,और वह माता लक्ष्मी को पुत्री रूप मे पाना चाहते थे,जिसके लिए वह तपस्या रत थे।एक बार जब वे अपने आश्रम से बाहर थे तो रावण वहा गया उसने उनके आश्रम को नष्ट कर डाला व वहा पर रह रहे ऋषिगण को मार डाला और उनका रक्त एक कलश मे भर लिया और लंका ले गया,और वहा उसने इसे छिपा दिया,इसी दौरान मंदोदरी रावण की पत्नि जो इस सब से अनभिज्ञ थी उसके हाथ यह कलश लग गया उसने देखा तो कुछ समझ न आया कि यह कलश मे क्या है उसने उसे चख कर देखा।और चखने मात्र से ही वह गर्भवती हो गई,जिससे उसने एक बालिका को जन्म दिया, तदुपरांत उसने इसे इसी कलश मे इस बालिका को बंद कर, मिथिला ले जाकर वहा की भूमि मे छिपा दिया,जो हल जोतते समय राजा जनक के हाथ लगी व सीता माँ के रूप मे राजा जनक को प्राप्त हुई।
और रावण की मृत्यु ही नही वरण उसके सर्वनाश का कारण भी बनी।।
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माता सीता के आठ नाम,
1=भूमिजा। (भूमि से प्रकट होने के कारण।)
2=जानकी।( राजा जनक की पुत्री रूप मे।)
3=लक्षाकी। (माँ लक्ष्मी के अवतार के चलते।)
4=मैथिली। ( मैथिली मे जन्म के चलते।)
5=मृणमयी। (मिट्टी से उपजने के चलते।)
6=सिया।(चंद्र की सी रूपवती के सौंदर्य बोध के चलते।)
7=वैदेही।(श्रीराम व जनक के संबंध के चलते।)
8=वनिका।(अधिकतर वन भ्रमण के चलते।)
प्रत्येक नाम अपनी विशिष्ट विशेषता के चलते पड़ा। जो नाम को चरितार्थ भी करता है।
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सीता माता की विशेष विशेषताएँ:-
माँ सीता,अपनी विभिन्न विशिष्ट विशेषताओं के कारण, सदैव महान मानी जाती रही है।यह विशेषताएँ है:-
गंभीर व शांत स्वभाव, सत्यवती, ईमानदार, आत्म विश्वास से परिपूर्ण, क्षमाशील, आत्म बलिदानी,सहनशील, अनिद्य सुन्दरी, इसी के चलते सिय नाम हुई।कुशल गृहिणी। आदर्श नारी,शुद्ध पवित्र व पावन,पत्नीव्रता,धर्म परायणा।।
माता सीता अपनी धर्माचरण से कभी च्युत होती न दिखी यही कारण है कि वह सदैव धर्म परायण कहलाई। जब भी वह जिस परिस्थिति मे भी हुई उन्होने धर्म को सदैव सर्वोपरि रखा व उसका सम्मान किया।
अब बात चाहे जनकपुरी मे शिक्षा दीक्षा की हो,कर्तव्य परायणता की हो,व नारी धर्म की प्रति मूर्ति की मिसाल की हो।वह सदैव हर कसौटी पर खरी उतरती दिखाई दी।
बाल्यकाल से ही वह जनक दुलारी लाड-प्यार मे भी कभी हठ करती नज़र न आई।वह सदैव मर्यादित रही व.उसकी स्थापना को एक उदाहरण बन दिखती पाई गई। जब स्वयंवर की बात आई तो भी,वह धनुष उठाने की शर्त को न पूरी हुए जाने पर भी विचलित न हुई, व पिता के विश्वास व ईश्वर पर आस्था के दृढ़संकल्प को धर्माचरण के रूप मे प्रस्तुत हुई।
राम वरण के पश्चात जब राज तिलक होना था और भाग्य ने वन गमन को प्रस्तुत किया तो भी वह उस धर्म के लिए स्व प्रस्तुत हुई। जबकि श्रीराम उनके कोमल स्वभाव व वन भय से परिचित थे तब भी उन्होने पति के साथ चल कर विपरीत परिस्थिति मे भी धर्म के उच्च स्तरीय उदाहरण को पेश किया और जीवन की हर परिस्थिति मे पति का साथ न छोड़ने के उद्देश्य से वन गमन स्वीकार किया।
इतना ही नही,वनवास के दौरान वह.जब सरयू नदी की पार उतराई को राम के दीन भाव को पहचानती है तो अपने हाथ की अंगूठी को सहज व सहर्ष केवट को भेंट दे देती है।वह पूरी निष्ठा से अपने पति को समर्पित धर्म की निभाती दिखती है वन मे भी वह रसोई पकाती दिखी व कभी कोई उलाहना करती नज़र न आई।और तो और जब रावण हरण को द्वार पर खड़ा था,ऐसे मे भी साधु कुटिया से खाली न लोट जाए तो वह धर्म की हानि न हो इसके लिए लक्ष्मण रेखा भी लांघती देखी गई।
और फिर जब बात स्त्रीत्व धर्म की रक्षा को आई तो तिनके मात्र से न केवल उसे सुरक्षित रखा बल्कि रावण का विरोध तक करती दिखी।
इसके साथ ही जब भी बात मुसीबत मे धैर्यवान होने की आई तो अपनी तीक्ष्ण बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए, रामदूत हनुमंत पर भी संदेह कर उसे परखती नज़र आई।यानि दुख के विशाल समुद्र मे होते हुए भी निति व निर्णय के धर्म पर खरी उतरी।व राम वियोग की असहनीयता को श्रीराम तक पहुँचाने मे अपने हर भाव से उनके प्रति समर्पण के धर्म को निभाती धर्माचरण को मुखरित करती दिखी।
और तो और, लंका विजय उपरांत जब बात पवित्रीकरण की आई तो अग्नि परीक्षण को भी धर्म मान स्वीकार करती दिखी।इतना कुछ होने के बाद भी एक धोबी के वाक्य को महत्व देते हुए श्रीराम से पुनः स्व को त्यागे जाने के लिए, राज धर्म को निभाती हुई वह कोमल नारी कठोरता की कठोरतम निर्णय मे धर्म की भट्टी मे स्व को सुवर्ण के समान तपाती नज़र आई।
और इतने मे भी यदि वह संतुष्ट होती तो महान तो हो जाती परन्तु उन्होने इससे भी अधिक बढ़कर राम जी के द्वारा लक्ष्मण जी को जब बाल्मिकी आश्रम छोड़ने को कहा तो वहा प्रसूता होने के चलते भी अपने बालको मे श्रीराम के गुण व धर्म के आचरण के ही संस्कार रोपित किए।
और अंत मे एक सवाल छोड़ते हुए धरती से पैदा हो धरती मे ही समा गई। यह थी रही धर्म की प्रति मूर्ति माँ सीता।।
राम के अनुज भ्राता भरत,लक्ष्मण या शत्रुघ्न की बात हो तो उनसे स्नेह धर्म तीनो माताओं माता कौशल्या माँ कैकयी, व माता सुमित्रा का आदर सम्मान की बात हो तो उनसे यथेष्ट पुत्री धर्म और तो और हनुमंत के प्रति पुत्रवत धर्म निभाती व अयोध्या के जनता के प्रति समर्पण धर्म तक निभाती दिखी माता जानकी।ऐसी धर्म परायणा रही माँ सीता।माँ जानकी व माता मैथिली।
धर्म क्या है ?
उत्तर संक्षिप्त है,कर्त्तव्य परायणता।
जब भी जो भी परिस्थिति हो उस पर आपका जो कर्त्तव्य बनता हो वहा कर्तव्यनिष्ठ होना या धर्म परायण होना ही धर्म है।
अर्थात आपके द्वारा किसी के लिए किसी को कष्ट न हो बल्कि गर कोई कष्ट मे है तो आप ऐसा प्रयास करे की उसके कष्ट का निवारण हो या उसमे आपका सहयोग हो ताकि उसका कष्ट या दुख दूर नही तो कम से कम कम तो हो सके।
और यही सब माँ भूमिजा करती दिखी।
राम के जीवन मे अनेक कष्ट थे वह उनके कष्ट को हर बार कम ही करती दिखी।तभी तो राम से पहले आप का नाम आया।और राम सीता की जगह सियाराम कहाया।।
संदीप शर्मा सरल, देहरादून उत्तराखंड।।













