
प्रथम गुरु जन्मदात्री मां!
जिसने निज अंक से लगाया।
सहकर असह्य प्रसव पीड़ा !
गर्भ के तम से जग उजियारा दिखलाया।
ममतामई मुस्कान ने उसकी !
इन अधरों को हिलना सिखलाया।
थाम के उंगली धीरे-धीरे से !
इस धरा पर चलना सिखलाया।
कोर सा था मन मस्तिष्क मेरा !
अपनी वाणी से मेरे शब्दों को आकार दिया।
धन्य है, प्रथम गुरु जननी मेरी !
जिसने सबसे पहले मुझे संस्कार दिया।
द्वितीय गुरु विद्यादायिनी शिक्षक !
जिनका हमेशा मुझ पर उपकार रहा।
अर्थ, धर्म, और ज्ञान का मार्ग सूझाकर !
मुझ अकिंचन को सुयोग्य एवं सुपात्र बनाया।
गीली मिट्टी सा मै रहा, गुरु मेरे कुम्हार सुजान ।
अंतर्मन मेरा संवार रहे देकर अपनी कठोरता का प्रमाण।
गुरुओं का सदैव से उद्देश्य रहा,
शिष्य को सत्य पथ पर लाना ।
अज्ञान रूपी तम को मिटाकर,
ज्ञान की दिव्य ज्योति जालना।
ऐसे हैं मेरे प्यारे गुरु जिनको,
करूं बार-बार प्रणाम ।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर !
करबद्ध नमन करूं आपका सम्मान।
स्वरचित :- उर्मिला ढौंडियाल’उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)













