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यादें जो ठहर गई

बूढ़े बरगद की छांव तले
अपने प्यारे गांव की।
सुख सुविधाओं का आज आलम है सारा।
पर मन बचपन की यादों का मारा।

वह रस्सी का झूला बरगद की शाखों पर
सपनों की उड़ान सा पेंगे भरता।
झूमता इठलाता हर बालक
जी भरकर मस्ती करता।

चिड़ियों की चहचहाट उस बरगद पर
कोयल की कुहू-कुहू मन को हर लेती।
देती शीतलता वट वृक्ष की छाया
हर प्राणी मात्र को सुकून पहुंचाती।

जान लेते थे एक-दूजे का सुख दुख
जब लगती चौपाल वहां पर।
शोर गुल करते रहते थे बच्चे
धमा चौकड़ी मचाते इधर-उधर।

सपना सा लगता है अब..
जैसे जिंदगी बिखरी हुई।
था, मनमौजी अल्हड़ सा बचपन
गुजरते वक्त के साथ यादें जो ठहर गई।

उर्मिला ढौंडियाल’उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)

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