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संस्कार प्रकाश

!! गर्भाधान संस्कार गर्भाधान संस्कार का सामान्य परिचय !!

‘गर्भाधान’ शब्द दो शब्दों के योग से बना है गर्भ+आधान आधान का सामान्य अर्थ है, स्थापित करना या रखना । इस प्रकार गर्भाधान का शब्दिक अर्थ है, पुरुष के द्वारा स्त्री के गर्भाशय में बीज रूप शुक्र का स्थापित करना । स्त्री को क्षेत्र {खेत} कहा गया है और पुरुष को बीज । जैसे बीजबोने के लिए भूमि {क्षेत्र-खेत} की आवश्यकता होती है, वैसे ही पुरुषरूपी बीज के स्त्रीरूपी क्षेत्रमें स्थापित होने की यथोचित क्रिया गर्भाधान है,
यद्यपि मानव पशुओं से भिन्न विवेक संपन्न प्राणी है तथापि उसे इस पाशविक धरातल से ऊपर उठाने के लिए और निरंकुश पाशविक प्रवृत्तियोंपर अंकुश लगाने के लिए दीर्घदर्शी ऋषि महर्षियोंने गर्भाधानादि धर्मिक संस्कारों का विधान बनाया ताकि स्वेछाचार तथा कामाचार पर नियंत्रण हो और सुसंस्कृत माता-पिता द्वारा उत्पन्न संतान आध्यात्मिक भावना से संपन्न हो ।।
जैसे अंतःकरण की शुद्धि के लिए भगवद्भक्ति शम-दम आदि अनेक साधन हैं, वैसे शरीर तथा बाह्य कारणों की शुद्धि संस्कारों से होती है । यद्यपि गर्भाधान-संस्कार का कृत्य बाह्य है, किन्तु इसका पूर्ण प्रभाव संतान के मन, बुद्धि, चित्त तथा हृदय पर विलक्षण रूप से होता है ।

गर्भाधन संस्कार के लिए माता-पिता का सदाचार संपन्न होना, ऋतु काल का उपस्थित होना, ऋतु काल में निषिद्ध तिथियों, नक्षत्रों पर्वों तथा योगों का परिहार करना, सहवास से पूर्व देवपूजन तथा वैदिक मंत्रों का पाठ करना, सुलक्षण तथा धर्मिक भावोंसे संपन्न संतति की कामना करना तथा प्रशन्नचित्त हो केवल संतानोत्पत्ति के लिए परस्पर सहवास करना इत्यादि जो धार्मिक, मानस एवं शारीरिक क्रियाएं हैं, उसके फलके सम्बन्ध में बताया गया है कि इस प्रकार के गर्भाधान द्वारा पुरुष का जो बीज सम्बन्धी दोष-पाप है,वह नष्ट हो जाता है और स्त्रीके गर्भ सम्बन्धी जो दोष होते हैं, वे नष्ट हो जाते हैं तथा क्षेत्र {गर्भाशय} की शुद्धि हो जाती है ।
गर्भाधान-संस्कार अनुष्ठान उस समय होता है, जब पति और पत्नी दोनों संतानोत्पत्ति के योग्य और स्वस्थ होते हैं, जब वे एक दूसरे के हृदय को जानते हैं और जब उनमें संतान उत्पन्न करने की प्रबल इच्छा होती है । उस समय देवपूजन और मंत्रों के द्वारा उपयुक्त वातावरण उपस्थित होता है तो ऐसे में वह स्त्रीप्रसंग ऐंद्रिय सुख नहीं अपितु एक सूक्ष्म यज्ञ का स्वरूप धारण करके पैतृक ऋणकी मुक्ति का साधन बनता है—
प्रजया पितृभ्यः ।
{तैत्तिरीय संहिता ६।३।१०।५}
गर्भाधन-संस्कार, विवाह-संस्कार की पूर्णता को व्यक्त करता है । गर्भाधान संस्कार होने पर मातृगर्भमें आत्मरूप जीवकी प्रतिष्ठा हो जानेपर, आगेके संस्कार सम्भव हैं, क्योंकि गर्भमें जीवके आनेपर ही आगे के पुंसवन, सीमांतोन्नयन तथा प्रसव के अनन्तर के जातकर्म आदि संस्कार होते हैं, इस दृष्टि से गर्भाधान-संस्कार का सर्वोपरि महत्व है । यथाविधि संस्कार के संपन्न होने पर पंचतत्वों की पंचकोशों की तथा मातासे उत्पन्न होने वाले त्वक्, मांस शोणित एवं पिता से उत्पन्न होने वाले अस्थि, स्नायु एवं मज्जा इन धातुओं की शुद्धि हो जाती है ।।
चराचर सभी भूतों का रस पृथ्वी है, पृथ्वी का रस जल है, जल का रस औषधियां है, औषधियों का रस पुष्प है, पुष्पोंका रस फल, फलों का रस {आधार} पुरुष है और पुरुष का रस {सार} शुक्र है,
इस रस {वीर्य}-की स्थापना के लिए प्रजापति ने स्त्री की सृष्टि की और दोनों के पवित्र सहवास से उत्पन्न संतान की प्राप्ति होती है
, वहाँ यह भी बताया गया कि,
जो पुरुष चाहे की मेरा पुत्र शुक्लवर्णका हो, वेद का अध्ययन करे ।
पूरीआयु अर्थात् सौ वर्ष तक जीवित रहे तो, दोनों पति-पत्नी को चाहिये की खीर बनाकर उसमें घी घृत डालकर सेवन करें । इससे वे वैसे पुत्र को जन्म देने में समर्थ होते हैं ।
स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो जायेत वेदमनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ।’
{बृहदारण्यक ६।४।१४}
विदुषी कन्या की प्राप्ति के लिए भी ऐसा ही प्रयोग बताया गया है ।
गर्भाधान क्रिया से संबद्ध मंत्रोंके भाव में बताया गया है– हे प्रिये ! सर्वव्यापी भगवान् विष्णु तेरी जननेंद्रियको पुत्र की उत्पति में समर्थ बनायें । भगवान सूर्य तेरे उत्पन्न होने वाले बालक के अंगों को विभागपूर्वक पुष्ट एवं दर्शनीय बनायें, विराट पुरुष भगवान प्रजापति मुझसे अभिन्न रूपमें स्थित हों तुझमें वीर्यका आधान करें । भगवान धाता तेरे गर्भका धारण और पोषण करें ।
हे देवि ! जिसकी भूरि-भूरि स्तुति की जाती है, वह सिनीवाली —
{जिसमें चंद्रमा की एक कला शेष रहती है वह अमावस्या} तुम हो, तुम यह गर्भ धारण करो – धारण करो । देव अश्वनी कुमार {सूर्य और चंद्रमा} अपनी किरण रूपी कमलों की माला धारण करके मुझसे अभिन्न रूप में तुझमें गर्भका आधान करें ।।

गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि पृथुष्टुके ।
गर्भं ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ।।

गर्भाधान के पूर्व था पश्चात् मंत्रों का स्मरण भारतीय आर्यचिंतन में ही संभव है, विश्व में इस प्रकार का प्रयोग कहीं नहीं है । इसी कारण ऋषियों का देश भारत जगतगुरु कहा गया है ।
इतना ही नहीं सुख पूर्वक प्रसव कैसे हो, इसका भी विधान यहां बताया गया है और प्रसव करने वाली स्त्री को सोष्यन्ती नाम से कहा गया है तथा मंत्र पूर्वक जलसिंचन की क्रिया को सुखप्रसव का उपाय बताया गया है ।।
{बृहदारण्यक ६।४।२३}
साभार— गीता प्रेस गोरखपुर
लेखन एवं प्रेषण—
पं. बलराम शरण शुक्ल
नवोदय नगर हरिद्वार

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