
दायरे इतने सीमित रखे है उसने ,कि वह दिवारो से झांकता है,
बंद खिड़कियों को रखा है, और,किवाडों से पग नापता है।।
पेंदे तक खाली है भीतर से,और डींग,गले तक भरने की हांकता है,
पता सब ही है मुझे ही ,इसी लिए वह हांफता है।।
सुनने को वह और सिर्फ वह,और कोई न झांकता है,
बंद कमरे मे,आई प्रज्ञता को,वह आसमान बांचता है।।
बोलने को ढेर ख़ामोशी,और कहने को,ढेर पता,है ,
कहे भी कहे तो फिर किसको,अहम से पड़ा दबा है।।
खबर,दुनियाभर की उसको, पर खबर अपनी का न पता,है,
खबरदार करता फिरता,आदमी है वह वैसे भला है।।
कमी है नही कुछ कोई, घर घर जिसे कहता है,
चार दिवारी,सौफे का सेट है,खाली बोतल से भरा पटा है।।
तस्वीर एक शौचालय,मे, अर्ध नग्न बनाई उसकी,
बस कमी है तो केवल इतनी,राग अपना अपनी ढफली।।
बादल भी कड़कनें वाले,बारिश किया नही करते,
फिर परिणाम प्रज्ञता के,यूँ ही नही दिया है करते।।
कौन समझाए गुरू को अपने,जब गुरूर मान है बैठे,
खाली जो होते बर्तन, आवाज ढेर है सारी करते।।
इक शख्सियत जिसे होना था,वह शख्स तक न रहा,
इसीलिए सरल कहते है,सरलता है सरस मजा।।
तुम मान दो सुनने को, बात सूक्ष्म ही हो भले ही,
यह सोच है व्यापक, कला सुनना औरो के की।।
और समझाए कौन कोई उसको,समझता कोई नही है,
स्वभाव है स्वभाविक, जो जागता जब सुबह वही है।।
संदीप शर्मा सरल
देहरादून उत्तराखंड













