
कब हो बर्षा? हरियाली छाये,
मधु ऋतु अपना शरगम सजाये।
हरियाली से प्रकट हों विविध रंग,
कब सावन अपनी आहट सुनाये।।
बर्षा ये ऐसे ही मीठी-मीठी फुहार।
सबको सावन का रहता है इन्तजार।।
धरती पर सजी हों कई रंगीन चादर,
चारों ओर जलमग्न दादुर और चमगादर।
नैराश्य नहीं है अब, झुरमुट से निकलो,
कहाँ छिपे हो, नमन तुम्हें सादर।।
ऐसे ही हँसी से भरा रहे घर-द्वार।
सबको सावन का रहता है इन्तजार।।
भर गईं हैं डालियाँ, पल्लव-प्रसूनों से,
मदमत्त झूम रही हवा के झकोरों से।
मँहकी-मँहकी है प्रकृति देख लाडली आ,
झुलाऊँ झूला, चले हवा कदम्ब के हिलोरों से।।
अम्बर व धरती पर शस्त्र सह अनंग, मार।
सबको सावन का रहता है इन्तजार।।
रचना-
जुगल किशोर त्रिपाठी
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)











