
गर्भाधान के उपयुक्त काल के विषय में धर्म ग्रंथो में बहुत विचार हुआ है ।
भौमार्कार्कीनाद्यरात्रीश्चतस्रः ।
गर्भाधानं त्र्युत्तरेन्द्वर्कमैत्र- ब्राह्मस्वातीविष्णुवस्वम्वुभे सत् ।।
गर्भाधान के लिए– सोमवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार, बुधवार, तीनों उत्तरा, मृगशिरा, हस्त, अनुराधा, रोहिणी, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा और शततारका— ये गर्भाधान के शुभ हैं ।
{यद्यपि पुस्तक मे निषिद्ध वार, तिथियां बहुत सारा कुछ लिखा हुआ है, लेखका विस्तार न-हो, इसलिए केवल आवश्यक जानकारी दी जा रही है ।}
गर्भाधान के समय की भावना—
सहवास के समय स्त्री और पुरुष की भावनाएं चेष्टाएं आहार और आहार जैसे होते हैं, संतान में भी ऐसी भावना और आहार आचार्य रहता है—
आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशीभि: समन्वितौ ।
स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तयोः पुत्रोऽपि तादृशः ।।
जो माता-पिता देवता, ब्राह्मण की पूजा {सत्कार} करते हैं शौच {पवित्रता} तथा सदाचार का पालन करते हैं, यह महान गुणशाली पुत्रों को उत्पन्न करते हैं, इसके विपरीत आचरण करने वाले माता-पिता निर्गुण संतान उत्पन्न करते हैं—
देवताब्राह्मणपरा: शौचाचारहिते रता: ।
महागुणान् पसूयन्ते विपरीतास्तु निर्गुणान् ।।
जिस भावना से जिस स्त्री-पुरुष का मिलन होता है, उसी भाव से युक्त संतान होती है । इसलिए गर्भाधान के समय मन में सुयोग्य उत्तम चरित्र से संपन्न गुणवान तथा धर्मात्मा पुत्रोत्पत्ति का भाव रखना चाहिए ।।
यादृशेन हि भावेन योनो शुक्रं समुत्सृजेत ।
तादृशेन हि भावेन सन्तानं सम्भवेदिति ।।
साभार– गीता प्रेस गोरखपुर
लेखन एवं प्रेषण—
पं. बलराम शरण शुक्ल
नवोदय नगर, हरिद्वार











