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“स्वप्निल शाम”

अद्भुत विहंगम दृश्य शाम का
क्षितिज पर स्वप्निल आभा।
आतुर खग नीड़ पर आने को,
कहीं रात ना, बन जाए बाधा।

शांत सिंधु मगर, कोलाहल लहरों का
जैसे, छिड़ा हो कोई अंतर्द्वंद मन का।
रह-रह कर लहरें आती हैं जाती हैं..
यादों से दामन को भिगो जाती हैं।

तनहाई में सुकून देता यह आलम…
कुछ पल ही सही, नहीं लगता अकेलापन।
बांट लेती हूं जलते अलाव संग….
यह सर्दी की, कंपकंपाती ठिठुरन।

उर्मिला ढौंडियाल’उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)

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