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गर्भाधान संस्कार के अंतर्गत गर्भिणी स्त्री की आवश्यक पालनीय नियम


जब गर्भ में संतान होती है तब माता-पिता जैसी सात्विक, राजसी, तामसी भावना से मन भावित रहती है, जैसी अच्छा-बुरा देखती, सुनती, पढ़ती, खाती, पीती है, उन सब का गर्भ में स्थित संतान पर प्रभाव पड़ता है इसलिए गर्भवती स्त्री को- राजस-तामस भावों से बचकर सात्विक भावनाएं करनी चाहिए । गंदे, अश्लील दृश्यों को न देखकर सात्विक देव दर्शन संत दर्शन करना चाहिए, सात्विक ग्रंथि पढ़ना सुनना सुनना चाहिए । राजश-तामस, मांस- मदिरा- अंडा- प्याज- लहसुन- अति तीक्ष्ण मिर्च-मसाला छोड़कर, सात्विक दूध- घी- दाल- रोटी आदि खाना पीना चाहिए ।
जिस प्रकार गर्भिणी स्त्री के लिए गर्भरक्षा तथा सुलक्षण संतान प्राप्ति के लिए पालनीय नियम बताए गए हैं, वैसे ही गर्भिणीस्त्री के पति के लिए भी शास्त्रों में धर्मशास्त्र सम्बन्धी-नियम बताए गए हैं तथा उसकी लिए भी वर्ज्य कर्मों का वर्णन हुआ है । इन नियमों की धर्मशास्त्रीय मर्यादा है ।
आश्वलायन ऋषि का कहना है कि, गर्भिणीके पति को चाहिए कि वह मुंडन, मैथुन तीर्थ यात्रा आदि न करे और सात महीनेका गर्भ हो जानेपर अनन्तर गर्भिणी स्त्रीका पति श्राद्ध ना करे । प्रयोगपारिजात मे बताया गया है कि श्राद्ध का भोजन भी ना करे । रत्नसंग्रह नामक ग्रंथमें गालवऋषि ने बताया है कि, जिसकी स्त्री गर्भवती हो उसकापति दाह, मुंडन चुड़ाकरण पर्वतारोहण और नौका पर चढ़ना आदि ना करे ।।
दोहद– {गर्भकालीन इच्छा}
गर्भिणी की अभिलाषा को दौहृद कहते हैं । ऐसी स्त्री जो अन्नपानादि विशेष द्रव्यों की अभिलाषा करती है दोहदवती कहलाती है ।
गर्भ के चारमास हो जाने पर गर्भ इंद्रिय के विषयों में चाह {इच्छा} करने लगता है ।अतः स्त्रीको दो हृदयवाली होने से ‘दौहृदिनी’ कहते हैं ।।
दौहृदय की इच्छा पूरी न होने से संतान विकृत होती है, इसलिए गर्भिणी जिस-जिस वस्तु की इच्छा करे, वह उसको देनी चाहिए । गर्भवती की इच्छा पूर्ण होने पर संतान वीर्यशाली और चिरायु होती है—
सा यद्यदिच्छेत्तत्तस्यै दापदयेत्, लब्धदौहृदा हि वीर्यवन्तं चिरायुषं च पुत्रं जनयति’ {सुश्रुत संहिता शारीरस्थान ३।१८}

गर्भवती स्त्री की इच्छा के पूर्ण होने पर गुणशाली पुत्र होता है गर्भवती स्त्री जिस
-जिस प्रकार की कामना करती है, वह उन्हीं पदार्थों के समान शरीर, आचार और स्वभाव वाली संतान को उत्पन्न करती है । पूर्वजन्मके कर्मों के कारण ही बालक का अगला शरीर बनता है, इस प्रकार दैवयोग {कर्मों के कारण}– से ही हृदय में दोहद {इच्छा} उत्पन्न होती है ।
गर्भ के शरीर में जिस समय इंद्रियां अभिव्यक्त होती हैं इस समय उसे गर्भ में के वेदना सुख-दुख की प्राप्ति होती है, इसलिए इस समय गर्भ में स्पंदन क्रिया होती है और अनेक जन्मों में अनुभव किए हुए इंद्रिय विषयों की वह इच्छा करता है और वह इच्छा माता की हृदय से व्यक्त होती है इसलिए उसकाल में उसकी संज्ञा दो हृदय वाली होती है । गर्भ का हृदय माता की हृदय से उत्पन्न होता है और गर्भ पोषण के लिए रहवाही धमनियों के द्वारा माता के हृदय से बालक का हृदय सम्बन्ध रहता है इसलिए उन रस वाहिनी धमनियों के द्वारा बालक अपनी इच्छा को माता के हृदय द्वारा प्रकट करता है ।

इसलिए तो दौहृदका अपमान नहीं किया जाता ऐसा करने से गर्भ का नाश या गर्भ में विकृति उत्पन्न हो जाती है । अतः प्रिय और हितकारी वस्तुओं के द्वारा गर्भिणी की परिचर्या की जाती है । अर्थात, जो गर्भिणी के लिए प्रिय-हित होता है, वह वस्तु उसके आहार-बिहार में दी जाती है ।।
जिससे गर्भ नष्ट होने का भय हो, उस आहार विहार से गर्भिणी को दूर रखें ।।
साभार— गीता प्रेस गोरखपुर
लेखन एवं प्रेषण—
पं. बलराम शरण शुक्ल
नवोदय नगर, हरिद्वार

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