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पुंसवन संस्कार


{गर्भाधान संस्कार की पद्धति गर्भाधान संस्कार प्रयोग गीता प्रेस से प्रकाशित पुस्तक संस्कार प्रकाश को देखें}
वास्तव में गर्भाधान संस्कार करना अपने आप में बहुत बड़े सौभाग्य की बात है ।।

पुंसवन संस्कार का तात्पर्य गर्भाधान संस्कार के अनन्तर जो पहले संस्कार होता है उसका नाम है पुन्सवन। यह संस्कार जन्म के पूर्व का संस्कार है गर्भाधान के अनन्तर स्त्री को नियमों का पालन करते हुए बड़ी सावधानी से रहना चाहिए, क्योंकि तीसरे, चौथे मास में तथा आठवें मास में गर्भपात की आशंका अधिक रहती है, इसलिए इन मासों में विशेष रूप से गर्भ रक्षणके लिए पुन्सवन तथा सीमांतोन्नयन संस्कार का विधान है ।
व्यास स्मृति में कहा गया है कि गर्भ जब तीन मास का हो तो उस समय पुन्सवन संस्कार करना चाहिए । चार मार्च तक गर्भ में स्त्री पुरुष का भेद नहीं होता है, अतः स्त्री-पुरुष के चिन्ह की उत्पत्ति के पूर्व ही यह संस्कार किया जाता है ।
‘पुन्सवन’ शब्द की व्याख्या दो प्रकार से की जाती है अर्थात् जब गर्भ में जीव किंचित सवन– स्पंदन, गति, हिलना’डुलना आदि करने लगता है तब इस संस्कार को करना चाहिए ।

पुन्सवन गर्भ संस्कार अथवा क्षेत्र संस्कार ।।

महर्षि देवल का कहना है—
सकृच्च संस्कृता नारी सर्वगर्भेषु संस्कृता ।
यं यं गर्भं प्रसूयेत स सर्वः संस्कृतो भवेत् ।।
अर्थात गर्भिणीस्त्री का प्रथम बार संस्कार हो जाने पर वह प्रत्येक गर्भ के लिए संस्कृत हो जाती है, अतः दोबारा गर्भधारण करने पर पुनः पुन्सवन संस्कार करने की आवश्यकता नहीं है ।।
गर्भधारण के दूसरे तीसरे महीने में अथवा गर्भ के प्रतीत होने पर इस संस्कार को करना चाहिए, पुन्सवन संस्कार समय पर न हो सके तो, आगे होने वाले सीमांतोन्नयन संस्कार के साथ भी किया जा सकता है । यदि तीसरे मास में गर्भ के चिन्ह प्रकट हो जाए तो तीसरे महीने में करना चाहिए और इस तीसरे माह में गर्भ व्यक्त न हो तो चौथा मास में पुन्सवन संस्कार करना चाहिए ।।

साभार— गीता प्रेस गोरखपुर
लेखन एवं प्रेषण—
पं. बलराम शरण शुक्ल
नवोदय नगर, हरिद्वार

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