
बड़े से मैदान में
30 फीट का रावण
जलाए जाने को तैयार खड़ा था।
उसके मन में
अफसोस बड़ा था।
मन ही मन खीज रहा था,
इंसानों पर लानत
भेज रहा था।
” यह इंसान बड़े नालायक हैं …
‘बुराई पर अच्छाई की
विजय होती है’
का शोर मचाते हैं।
मेरा पुतला जलाते हैं,
पर खुद के समाज में
अच्छाई का मुखौटा पहने लोग
मोह, क्रोध, लोभ रूपी रावण को
सहेजते हैं, सम्मान देते हैं।
इनके समाज मे
हर दिन जाने कितनी ‘सीताओं’ का
अपहरण एवं शोषण होता है।
लोग अच्छे दिन के इंतजार में
चुप रहते हैं।
मुंह नहीं खोलते हैं।
अपने अंदर के रावण को
कभी नहीं मारते हैं।
परंतु साल में एक बार
‘ रावण दहन’ अवश्य करते हैं —-“











