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कविता—-“दशहरा का सार”

फूंक कर पुतला दशहरा मानना, दशहरा मनाने की महज़ रीत है यही।।

मन का दशानन दशहरा नहीं,
भीतर के रावण को जलाकर
जो माने,
सच मानो कि,सच्चा दशहरा है वही।।

बाहर तो बस जलता है पुतला,
असली युद्ध तो मन के सिंहासन पर है चलता।।

अहंकार की दस सिरों वाली छाया,
क्रोध, लोभ और मोह की माया।।

मन में बैठी, अज्ञान की लंका,
करती है हर अच्छे कर्म पर शंका।।

राम जी हैं सद्बुद्धि की तलवार,
सीता जी हैं,एक पवित्र विचार।।

हनुमान जी हैं,साहस का बल
और शक्ति का प्रतीक है हर पल।।

नहीं जलाना है सिर्फ़ कागज़ का रावण,
जलाना है हर वो बुरा आचरण।।

जो ईर्ष्या का विष रगों में है घोलता,
जो झूठ की ज़ुबां से हरदम है बोलता।।

“रीनू कहती”
आज दशमी की है ये शुभ बेला,
करें संकल्प,लगाएं सत्य मेला।।

शुभ की अशुभ पर हो फिर से विजय,
तभी पूर्ण होगी असली दशहरा की फतह।।

फूंक कर पुतला दशहरा मानना, दशहरा मनाने की महज़ एक रीत है ।।

मन का दशानन दशहरा नहीं,
भीतर के रावण को जलाकर,
जो माने,
सच मानो कि,सच्चा दशहरा वही है।।

    श्रीमती रीना पटले,

सिवनी (मध्य प्रदेश) भारत

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