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आज़ादी

आज़ादी-आज़ादी के नारों से
फिर चारों दिशाएँ गूंज रही हैं।
किस-किस को चाहिए आज़ादी?
अंबर और धरती पूछ रहे हैं—
कौन यहाँ गुलाम है?
और किसका यहाँ राज है?
ये बहती नदियाँ भी सवाल कर रही हैं।

सुना था एक बूढ़े ने बरसों पहले,
बदन पर धोती लपेटे, हाथ में डंडा लिए
देश के लिए लड़ा था अहिंसा से,
अंग्रेज़ों के गाल पर
थप्पड़ जड़ा था।

पर अब सवाल वही है—
आज़ादी किससे?
और गुलाम कौन है यहाँ?

अनशन किया, भूखा रहा,
वस्त्र त्यागे, तन को जला दिया।
नाहक ही, कुछ सियासी दुश्मनों ने
फिर से उसे मार दिया।
आर एस लॉस्टम

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