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विजयादशमी

असत्य के महल भले ही, हों ऊँचे आकाश समान,
सत्य की नींव अडिग रहती, पाता है वह सदा सम्मान।
रावण का दंभ जला आज, राम का ध्वज लहराया,
धर्म और नीति के पथ पर, विजय पताका फहराया।

अहंकार का अंत यही है, छल का चेहरा ढह जाता,
सत्य की दीपशिखा जग में, अंधकार को हर जाता।
धनुर्धर राम की दृढ़ता से, जग ने यह संदेश पाया,
सत्याग्रह ही जीवनधर्म है, जिसने भी अपनाया।

विजयादशमी का पर्व कहे, मत चलो छल के पथ पर,
राम समान बनो जीवन में, सत्य बसाओ हर रथ पर।
असत्य का होगा विनाश सदा, सत्य रहेगा अजर-अमर,
यह शुभ दिवस सुनाता जग को, संदेश अमूल्य अमर।

शस्त्र नहीं शास्त्रों में केवल, सत्य से मिलती है ताकत,
राम का जीवन सिखाता है, प्रेम करे हरदम विजयरथ।
सीता की मर्यादा रक्षा, लक्ष्मण का अनुशासन गाथा,
भरत का त्याग सिखाता है, धर्म पथ ही सच्चा माथा।

संगठित होकर जब जनता, सत्य-धर्म का साथ निभाती,
रावण जैसे दंभियों की, नींव स्वयं ही हिल जाती।
विजयादशमी हमें जगाती, हर मन में दीप जलाने,
रामकथा से प्रेरणा लेकर, जीवन पथ पर बढ़ जाने।

जहाँ कहीं अन्याय मिलेगा, खड़ा वहीं हो वीर बने,
सत्य और करुणा से जग में, रामराज्य के बीज तले।
विजयादशमी पुकार रही है, जीवन हो सत्यमय सदा,
धर्म, प्रेम और नीति-पथ से, जग में छाए उजियारा।

योगेश गहतोड़ी “यश”

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