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काव्य –इस एक बगिया को भी महका दो ना तुम

सावन के बादलों सी तुम छाई हुई,
प्यार की कुछ बूंदे भी बरसा दो ना तुम।

मैं, जैसे सूख रहा हो उपवन कोई,
इस एक बगिया को भी महका दो ना तुम।

स्वाति की जैसे बूंदे हो तुम,
मैं एक चकोर सा प्यासा हूं,

बादलों की ओट में तुम छुपी हुई सी,
उस एक बादल को भी सरका दो ना तुम।

मैं, जैसे सूख रहा हो उपवन कोई,
इस एक बगिया को भी महका दो ना तुम।

आंखें हो गर बंद, तो दिखती हो तुम,
मेरी हर सांस में, जैसे बसती हो तुम,

छा गई है नीरवता सी इस बगियन में,
बरसा के प्यार अपना, इसे चहका दो ना तुम।

मैं, जैसे सूख रहा हो उपवन कोई,
इस एक बगिया को भी महका दो ना तुम।

बोझिल हो चुके इस जीवन में,
बुझने लगा है, अब मन भी जैसे,

अपने मधुर प्रेम की चिंगारी से,
इस मन को भी दहका दो ना तुम।

मैं, जैसे सूख रहा हो उपवन कोई,
इस एक बगिया को भी महका दो ना तुम।
इस एक बगिया को भी महका दो ना तुम।।


प्रमोद सामंतराय
सरायपाली, महासमुंद (छ.ग.)

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