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त्याग (पंच प्रायश्चित)

त्याग है मन की ऊँची उड़ान,
जहाँ मिटता है ‘मैं’ का अभिमान।
लोभ, मोह, वासना के बंधन,
कटते हैं जैसे सुधा के चंदन।।

जब मन कहे — “मेरा”, “मुझमें”,
तब आत्मा खो जाए तुझमें।
त्याग वही जब न दिखे स्वार्थ,
बस परम शांति हो उसका अर्थ।।

वस्त्र नहीं, मन का आवरण उतरे,
अहंकार की दीवारें भीतर से गिरे।
जिसने अपनाया सच्चा विराग,
उसने पाया आत्मा का पराग।।

त्याग न केवल वस्तु का दान,
यह तो अंतर का पावन ज्ञान।
जहाँ इच्छाएँ शांत हो जातीं,
और प्रभु-स्मृति में लय पातीं।।

जो छोड़ दे जग का मोह जाल,
वही पाता है सच्चा निहाल।
त्याग है तप, त्याग है योग,
इसी में छिपा जीवन का संयोग।।

त्याग सिखाता — “छोड़ो, तभी पाओ”,
स्वयं को मिटाकर सत्य बन जाओ।
यह पंच प्रायश्चित का अमृत भाग,
जहाँ मानव बनता दिव्य सुहाग।।

योगेश गहतोड़ी “यश”

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