
मुखौटा — जीवन भी, मौत भी,
आज, कल, और आने वाला हर कल भी मुखौटा।
कर्म, कुकर्म, और सत्य कर्म —
सबके पीछे छुपा है एक मुखौटा।
पूरा जीवन, परिचय, और पहचान,
छुपाता है यही मुखौटा।
मंज़िल, रास्ता, मुसाफ़िर —
सब चलते हैं मुखौटे में लिपटे हुए।
इंसान जीता है मुखौटा पहनकर,
और मरता भी मुखौटे में ही।
मुखौटा — वह अमृत है
जो इंसान को अमर तो नहीं बनाता,
पर उसके झूठे अस्तित्व को
हमेशा जिंदा रखता है।
क्योंकि जो मुखौटे में जीता है,
वह आख़िर में खुद भी
एक मुखौटा बन जाता है।
आर एस लॉस्टम












