
पुराने समय की बात है। एक छोटे से गाँव में हरिदास नाम का कुम्हार रहता था। उसकी हथेलियाँ जीवन भर मिट्टी को आकार देती रही और वह रोज अपने काम में दिन-रात व्यस्त रहता था। उसका चेहरा समय की लकीरों से भरा था, लेकिन आँखों में उत्सुकता और चमक झलकती थी। हरिदास रोज मिट्टी लेता, उसे पानी से गूँथता, चाक पर घुमाता और धीरे-धीरे अपने हाथों की कलाकृति से सुन्दर मिट्टी के वर्तन बनाता था।
गाँव वाले उससे अक्सर पूछते, “हरिदास, इतनी मेहनत से पात्र बनाते हो, फिर भी यह टूट जाते हैं?”
हरिदास हल्के से मुस्कराकर बोला —
“टूटना अंत नहीं, परिवर्तन है। क्षणभंगुरता के भीतर ही तो अंतहीनता का सौंदर्य छिपा है।”
हरिदास का चाक दिनभर घूमता रहता था। वह कहा करता—
“यह चाक समय का प्रतीक है। मैं बूढ़ा हो जाऊँ या मिट्टी बदल जाए, इसकी गति नहीं रुकती। यही जीवन है—अंतहीन, अनवरत।”
हरिदास अक्सर अपने घर के पास बहती नदी के किनारे बैठा करता। मिट्टी उसके हाथों में होती, पर मन किसी गहरी तंद्रा में लीन हो जाता।
नदी की कल-कल ध्वनि उसे जैसे पुकारती—
“मैं इसलिए बहती हूँ क्योंकि रुकना ही अंत है। जो बहता है, वही जीवित है, वही अनंत है।”
हरिदास को लगा, मिट्टी, जल और वायु — ये तीनों ही ब्रह्म की भाषा हैं। मिट्टी रूप देती है, जल प्रवाह देता है और वायु गति देती है। रूप बदलता है, पर तत्व नहीं। यही तो अंतहीनता है।
एक दिन उसका शिष्य पूछ बैठा, “गुरुजी, जब सब मिट जाता है, तो फिर रचना क्यों करते हो?”
हरिदास मुस्कराया और बोला —
“क्योंकि मिटना ही रचना का दूसरा रूप है। मिट्टी से पात्र, पात्र से धूल और धूल से फिर मिट्टी — यह चक्र कभी नहीं रुकता। यही अंतहीन चक्र ही जीवन का सत्य है।”
उसने मिट्टी को चाक पर रखकर कहा —
“हर सृजन अपने भीतर विनाश समेटे होता है और हर विनाश अपने भीतर सृजन। जब यह समझ लोगे, तब जानोगे कि जीवन का कोई अंत नहीं — केवल अंतहीन प्रवाह है।”
वृद्धावस्था में हरिदास के हाथ थक चुके थे। अब वह कम बोलता, कम काम करता, पर उसकी आँखों की चमक और भी गहरी हो गई थी।
गाँव वाले कहते — “अब वह कुछ नहीं करता।”
पर वे नहीं जानते थे कि हरिदास अब ‘कर’ नहीं रहा था, वह ‘हो’ रहा था। उसका मौन, उसकी उपस्थिति और उसकी दृष्टि, सब कुछ एक साधना बन चुके थे।
अब वह शब्दों से नहीं, अपने अस्तित्व से सिखा रहा था कि सच्चा अंत कभी नहीं होता।
जब हरिदास की मृत्यु समीप आई, तो उसने अपने शिष्य का हाथ थामा और मुस्कराकर कहा —
“बेटा, जिसे तुम अंत कहते हो, वही एक नया आरंभ है। मृत्यु कोई समाप्ति नहीं, बस विलय है — उस असीम में लौट जाना, जिससे सब उत्पन्न हुआ था।
मिट्टी, जल और वायु की तरह आत्मा भी अपने तत्वों में मिल जाती है। रूप मिटता है, पर प्रवाह चलता रहता है। यही अंतहीनता है।”
यह सुनकर शिष्य की आँखें नम हो गई।
हरिदास ने गहरी सांस ली और बिना किसी भय, बिना किसी विदाई के, शांत भाव से विलीन हो गया।
कुछ दिन बाद शिष्य ने वही मिट्टी उठाई, वही गति, वही लय से चाक अनवरत घूमता रहा — जैसे हरिदास अब भी वहीं हो, उसी गति में, उसी प्रवाह में, उसी क्षण, चाक फिर से घूम उठा।
शिष्य अब हरिदास की तरह मिट्टी को केवल आकार नहीं देता, बल्कि उसमें जीवन की लय सुनता है। उसके लिए हर पात्र, हर चाक की घूमती रेखा और हर मिट्टी का कण — गुरु की स्मृति का प्रतीक बन चुका था। वह समझ गया था कि सृजन और विनाश दो नहीं, एक ही प्रवाह के दो छोर हैं। मिट्टी में अब उसे हरिदास का स्पर्श, नदी की आवाज़ और उस मौन का संगीत सुनाई देता था, जिसमें अनंतता का संदेश समाया हुआ था।
समय बीतता गया, पीढ़ियाँ बदलती गईं, पर हरिदास की साधना उस चाक की गति में आज भी जीवित है। गाँव के बच्चे जब चाक को घूमते देखते हैं, तो कहते हैं — “यह कभी रुकता नहीं।”
शायद वे नहीं जानते कि यह हरिदास का जीवन है, जो मिट्टी से उठकर प्रवाह में विलीन होकर भी, सदा चलता जा रहा है, क्योंकि जो अंतहीन है, वह कभी समाप्त नहीं होता। वह बस रूप बदलता है और जीवन बनकर अनंत में बहता रहता है।
अंततः यह कहानी हमें संदेश देती है कि जीवन अंत नहीं, एक निरंतर प्रवाह है। सृजन और विनाश, जन्म और मृत्यु सब उसी ‘अंतहीन’ चक्र के हिस्से हैं।
योगेश गहतोड़ी “यश”











