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पैसे की बात!

दो पैसे के लिए लोग बिक जाते हैं,
अपनों को भी ठगकर टिक जाते हैं।

सच बोलना अब घाटे का सौदा है,
झूठ बोलो — तो सब झुक जाते हैं।

नेता झूठ को सच बतलाते हैं,
संत भी ब्रांड बन जाते हैं।

ईमान अगर बेच दो थोड़े नोटों में,
तो समाज में “सफल” कहलाते हैं।

कभी इंसानियत थी सबसे ऊँची जात,
अब तो सब कुछ — पैसे की बात!

सुनीता बंसल
पुणे महाराष्ट्र।

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