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चमकीला ठाट बाट


एक से लेके पाॅंच तक ,
झूठ से लेके साॅंच तक ,
सिमट के रह गईल दुनिया ,
आज खाली काॅंच तक ।
असली नाटक गोल बाटे ,
नकली नाटक अपनावेला ,
असली चेहरा आपन नुकाके ,
नकलीए चेहरा देखावेला ।
हलुक मद्धिम ऑंच तक ,
पर्दा के आगे नाच तक ,
सीमट के रह गईल दुनिया ,
बेहद चमकीला काॅंच तक ।
मरकरी में चमकीला पावडर ,
सीधे देख ऑंख चौंधियात बा ,
पहिले पन में चश्मा लागल ,
नजदीकि अक्षर ना बुझात बा ।
जीवन के छोट मोट खाॅंच तक ,
कर्म फल से लेके जाॅंच तक ,
सीमट के रह गईल दुनिया ,
बेहद चमकीला काॅंच तक ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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