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छूट गया वो पल


रचना : हरनारायण कुर्रे
श्रेणी -काव्य
मुड़पार चु पोस्ट रसौटा तहसील पामगढ़ जिला जांजगीर छत्तीसगढ़
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छूट गया वो पल

छूट गया वो पल… जब ज़िंदगी मुस्कुरा रही थी,
हवा में तेरी खुशबू घुली जा रही थी,
फूलों की महक में तेरा एहसास था,
हर दिशा में बस तू, हर सांस में तू खास था।

वो बाग़ के किनारे, पेड़ों की छांव तले,
जब तितलियाँ भी नाम तेरा गुनगुनाती थीं खुले,
सूरज ढलता था तेरी हंसी के संग,
और चाँद भी शरमाता था तेरे रंग।

वो बारिश की बूँदें जब गिरती थीं ज़मीं पर,
तेरे पाँवों की छाप बनती थी नमीं पर,
मिट्टी की खुशबू जैसे तेरा संदेश लाती थी,
हर बूँद में तेरी याद जगाती थी।

ख्वाब… सपना… कभी ऐसा होता है क्या?
जो आंखें बंद करूँ, तो बस तेरा चेहरा होता है क्या?
वो सपनों की घाटी, वो झरनों की तान,
हर दृश्य में दिखता तेरा ही सम्मान।

अब तो सुबह भी अधूरी लगती है,
जब तेरी बातों की बारिश नहीं होती है।
वो धूप में भी अब साया नहीं,
तेरे बिना ये मन पाया नहीं।

कभी खेतों में गूँजती थी हमारी हँसी,
अब वही खेत सुनाते हैं खामोशी की कहानी।
कभी तालाब के जल में देखता था तेरा चेहरा,
अब लहरों में ढूँढता हूँ वो खोया सवेरा।

पहाड़ों की चोटी पे खड़ा होकर सोचता हूँ,
क्यों ज़िंदगी से वो पल छूट गया?
जहाँ तू थी, मैं था, और बस प्रेम था,
अब बस तन्हाई का मौसम छा गया।

ख्वाब में आता है तू, फूलों के बाग़ में,
हवा संग खेलती है तेरी चूड़ी की झंकार में।
मैं पुकारता हूँ, पर आवाज़ लौट आती है,
तेरी याद फिर आंखों को भिगो जाती है।

वो पल जब तेरे संग बारिश में भीगे थे,
मिट्टी में लिखे नाम अब भी जिए थे।
कितनी बार सोचा—फिर वही पल लौट आएँ,
पर किस्मत ने कहा—वो सिर्फ़ याद बन जाएँ।

अब जब चाँद निकलता है अकेली रातों में,
तेरी परछाई दिखती है उजली बातों में।
सितारे भी जैसे तेरी आँखों की नमी लिए,
हर रात तुझे ही याद किए।

छूट गया वो पल… पर सांसें वहीं अटकी हैं,
जहाँ तू मुस्कुराई थी, वो गलियाँ रुकी हैं।
तेरी यादों का सागर आज भी बहता है,
हर लहर में मेरा दिल तुझसे कहता है—

“ख्वाब… सपना… कभी ऐसा होता है क्या?
कि जागते हुए भी कोई सपना जीता है क्या?
छूट गया वो पल… पर तेरे बिना,

ज़िंदा हूँ, मगर जैसे अधूरा गीत गुनगुनाता हूँ…”

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