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उपवास- लघु कथा

एकादशी का दिन था। सुबह की हल्की धूप आँगन में फैल रही थी। कमला देवी ने स्नान कर अपने मंदिर में घी का दीपक प्रज्वलित किया। सुगंधित धूपबत्ती की खुशबू पूरे घर में फैल गई। पूजा के बाद उन्होंने घर के सभी सदस्यों को नाश्ता कराया, पर स्वयं केवल तुलसी का जल पीकर फिर से मंदिर में बैठ गईं।

थोड़ी देर बाद उनकी पोती नैना पास आई और बोली —
“दादी, आप आज कुछ नहीं खाएँगी? आपको भूख नहीं लगेगी?”

कमला देवी मुस्कराईं, “नैना बेटा, आज मेरा एकादशी का व्रत है, इसलिए मैं उपवास कर रही हूँ।”

नैना ने भोलेपन से पूछा, “मतलब एकादशी के दिन क्या सबको उपवास करना चाहिए?”

कमला देवी ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया,
“नहीं बेटा, इस संसार में हर व्यक्ति अपनी श्रद्धा और शारीरिक सामर्थ्य के अनुसार उपवास करता है। उपवास का अर्थ केवल खाना न खाना नहीं होता। ‘उप’ का अर्थ है निकट और ‘वास’ का अर्थ है रहना — यानी ईश्वर के निकट रहना।”

नैना की आँखों में जिज्ञासा चमक उठी।
“तो दादी, हम ईश्वर के निकट कैसे जा सकते हैं?”

कमला देवी ने ममता भरे स्वर में कहा,
“व्रत के दिन हम झूठ नहीं बोलते, किसी को दु:ख नहीं देते और ज़रूरतमंद की मदद करते हैं। जब हम ऐसा करते हैं, तब हम भगवान के और करीब होते हैं। यही सच्चा उपवास है।”

नैना कुछ पल सोचती रही, फिर मासूमियत से बोली,
“दादी, व्रत के दिन ही झूठ क्यों नहीं बोलते, किसी को दुःख क्यों नहीं देते और क्यों जरूरतमंद की मदद करते हैं? अगर उपवास इन अच्छे कामों से होता है, तो हम यह सब यह काम रोज़ क्यों नहीं करते?”

पोती की बात सुनकर कमला देवी कुछ क्षण के लिए मौन रह गईं। फिर धीरे-धीरे बोलीं,
“बेटा, हम मनुष्य हैं। जाने-अनजाने या परिस्थितिवश हम रोज़ अपने मन को इतना संयमित नहीं रख पाते। इसलिए कुछ विशेष दिनों में भगवान को याद करते हुए हम ‘व्रत’ या ‘उपवास’ का पालन करते हैं, ताकि अपने काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार पर नियंत्रण रख सकें और अपने मन को शुद्ध बना सकें।”

इतने में दरवाज़े पर दस्तक हुई। बाहर एक गरीब दूधवाला खड़ा था। थका हुआ, पसीने से तर, बोला —
“माँजी, आज दूध ले लीजिए, पर पैसे कल दे दीजिएगा। बच्चे भूखे हैं, अगर कुछ रोटी मिल जाए तो दे दीजिए।”

कमला देवी तुरंत रसोई में गईं और परसाद के लिए रखी हुई फल की थाली उठाकर उसे दे दी।
दूधवाले ने हाथ जोड़कर कहा, “माँजी, भगवान आपको खुश रखें और वह भावुक होकर चला गया।

नैना ने यह दृश्य देखा और बोली,
“दादी, आपने तो उपवास तोड़ दिया!”

कमला देवी मुस्कराईं,
“नहीं बेटा, मैंने उपवास पूरा किया है। जब किसी भूखे को भोजन मिलता है, तब ही भगवान प्रसन्न होते हैं।”

नैना चुप हो गई, उसकी आँखों में चमक आ गई। वह धीरे से बोली,
“अब समझी दादी — सच्चा उपवास पेट खाली रखने से नहीं, दिल को प्रेम और दया से भरने से होता है।”

कमला देवी ने उसके सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा,
“सही कहा बेटा, जब मनुष्य छल-कपट से मुक्त होकर दयालु बनता है और उसका मन निर्मल हो जाता है, तभी वह सच में ईश्वर के निकट होता है और यही सच्चा उपवास है।”

योगेश गहतोड़ी “यश”

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