
चाचा के चरित्र विचित्र लिखने लगा हूँ,
उनकी कुछ कहानियों से सीखने लगा हूँ।
गुलाब मैंने भी रखा था एक दिन शर्ट की जेब में,
पर शरीफ़ समझ — लोग मुझे चिढ़ाने लगे थे।
रात सपने में जिन्न ने जगा दिया,
सन् 1947 की बर्बरता याद दिला दिया।
क्या वो घड़ी थी — लहू वाली,
मेरे अपनों के खून में लिपटी लाश दिखाई दीए।
दादी के जुबानी कुछ कहानियाँ सुनी थी हमने,
लाशों पर लाश, खून की नदियाँ देखी थी हमने।
लाशों के अंबार में अपनों को खोजते लोग,
चीखते, चिल्लाते, डर की छाया जीती थी हमने।
रात के सपनों ने जिन्न ने फिर से याद दिला दिया,
दादी की कहानी, दर्द का हर रंग सीखा दिया।
हर लाश में छुपा था वो भय और वो अफ़साना,
पर उम्मीद ने फिर भी जीवन का सबक दिखा दिया।
रूपेश सिंह लॉस्टम













