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वरिष्ठ जन: हमारे सम्बल

हमारी भारतीय सनातन परंपरा में बुजुर्गों और वरिष्ठ जनों का हमारे समाज में अति विशिष्ट व महत्वपूर्ण स्थान होता है।

कहा गया है कि:

आचार्यश्च पिता चैव
माता भ्रात च पूर्वज:।
नार्तेनाप्यवमन्तव्या
ब्राह्मणेन विशेषत:।

आचार्यो ब्राह्मणो मूर्तिः
पिता मूर्तिः प्रजापतेः।
माता पृथिव्याः मूर्तिस्तु
भ्राता स्वो मूर्तिरात्मनः।

अर्थात्- दुखी होने पर भी आचार्य, माता, पिता और ज्येष्ठ भ्राता, इन लोगों का अपमान नहीं करना चाहिए, विशेषकर बुजुर्गों की अनदेखी भी नहीं करना चाहिए। आचार्य ब्रह्म-मूर्ति होता है। पिता ब्रह्मा की, माता पृथ्वी की और भाई अपनी स्वयं की मूर्ति होता है। हमारे शास्त्रों, स्मृतियों और पौराणिक ग्रंथों के पढ़ने से कुछ न कुछ ज्ञान अवश्य मिलता है।

वरिष्ठ नागरिक हमारे समाज का अमूल्य स्तंभ होते हैं, जो अपने अनुभवों, अपने ज्ञान और मार्गदर्शन से युवा पीढ़ी को राह दिखाते हैं और समाज को एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं। अतएव उनका सम्मान करना हमारी भारतीय सांस्कृतिक और सामाजिक सभ्यता का प्रतीक है, और उन्हें स्वस्थ, खुशहाल, सशक्त और आत्मनिर्भर जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए।

वरिष्ठ नागरिक ज्ञान और अनुभव के भंडार: होते हैं। वे जीवन के उतार चढ़ाव और अनुभवों से परिपूर्ण होते हैं, जिससे वे ही आने वाली पीढ़ियों को मुश्किलों का सामना करने और सही राह चुनने में मदद करते हैं।
हमारे वरिष्ठ जन हमारी
सांस्कृतिक और सामाजिक धरोहर हैं। वे पारंपरिक मान्यताओं और हमारी संस्कृति के संरक्षक होते हैं, और उनके माध्यम से ही पुरानी प्रथाओं और अच्छी परंपराओं को आगे बढ़ाया जाता है।

वरिष्ठ नागरिक हमारे समाज के मार्गदर्शक होते हैं। वे समाज के लिए प्रेरणा स्रोत होते हैं और अपने कार्यानुभवों से दूसरों को सही रास्ता अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।
वरिष्ठ नागरिकों के प्रति हमारा कर्तव्य होता है कि हम उनका सदैव सम्मान करें और उनकी हर संभव सेवा और देखभाल करें। उन्हें स्वास्थ्य सेवा, वित्तीय सहायता और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है, जिसकी देखरेख समाज का महत्वपूर्ण कर्तव्य और दायित्व होता है।

इसीलिये हमारी सरकार और समाज वरिष्ठ नागरिकों की सुविधा के लिए विशेष काउंटर, स्वास्थ्य सुविधाएँ, वृद्धावस्था पेंशन, व्हीलचेयर और रैंप जैसी सुविधाएं प्रदान करते हैं। सरकारी नीतियों में वरिष्ठ नागरिकों की स्वास्थ्य देखभाल, वित्तीय सुरक्षा और पेंशन से जुड़ी जरूरतों को प्राथमिकता दी जाती है।
सरकारी प्रयासों के तहत
रेलवे और अन्य परिवहन सेवाओं में वरिष्ठ नागरिकों को किराए में छूट प्रदान की जाती है।

इस आलेख का संक्षेप निष्कर्ष यही है कि हमें वरिष्ठ नागरिकों का पूरा सम्मान करना चाहिए और उनकी देखभाल करना न केवल हमारी एक नैतिक जिम्मेदारी है, बल्कि यह एक मजबूत सशक्त और समृद्ध समाज के निर्माण के लिए भी अत्यन्त आवश्यक है।

डा कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ:

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