
वितर्कविचारानन्दास्मिताऽनुगमात्सम्प्रज्ञातः ।
वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात्= वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता — इन चारों के सम्बन्ध से युक्त {चित्त वृत्ति का समाधान} सम्प्रज्ञात:= सम्प्रज्ञातयोग है ।
अनुवाद– वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता इन चारों के सम्बन्ध से युक्त चित्त वृत्ति का समाधान सम्प्रज्ञात योग {समाधि} है ।
व्याख्या– इस समाधिपाद में महर्षि पतंजलि ने सर्वप्रथम योग की परिभाषा देते हुए कहा है की चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है ।
इस निरोध के फल स्वरूप आत्मा अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है । इसी को योग, मोक्ष, निर्वाण या कैवल्य की स्थिति कहते हैं । इसके बाद वृत्तियों के भेद तथा उनके निरोध का उपाय बतलाया गया है ।
इस निरोध के फलस्वरूप साधक को समाधि-लाभ होता है जिसका वर्णन आगे के सूत्रों में किया गया है । इस सूत्र में विभिन्न प्रकार की समाधियों का वर्णन है । सबसे पहले सम्प्रज्ञात समाधि का स्वरूप बताया गया है कि जब वशीकार वैराग्य हो जाता है अर्थात् मन वश में होने पर भोगों के प्रति तृष्णा हट जाती है तो इसे सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं ।
इस समाधि का चित्तवृत्ति का समाधान हो जाता है । वह बाहर भागने से तो रुक जाती है किंतु भीतर अचेतन मन में बीज रूप में विद्यमान रहती है । यह सम्प्रज्ञात समाधि भी क्रम से सिद्ध होती है । चित्त की वृत्तियों का सम्बन्ध वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता से है । इन चारों का क्रम से निरोध होता है । अतः इन चारों के निरोध से घटित समाधि भी चार प्रकार की कही जाती है ।
बाहर से जो ज्ञान या अनुभव होता है वह भीतर संग्रहित रहता है तथा समय आने पर उसे पुनः उगल देते हैं यह वितर्क स्थित है । इसमें क्रमबद्धता नहीं होती तथा यह प्रमाणिक भी नहीं होता ।
ये विचार स्वयं के नहीं दूसरों से उधार लिए होते हैं अतः इस स्थिति में संशय बना रहता है, तर्क वितर्क चलता रहता है । जब इंद्रियों के ग्राह्य पदार्थों के स्थूल रूपों का तो निरोध हो जाता है किंतु इसका विकल्प शब्द अर्थ और ज्ञान बना रहता है । इस प्रकार की समाधि को ‘सवितर्क समाधि’ कहते हैं ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













