
तुम प्रेम पाश मे बांध जो लो,मैं अविरल सा पंछी बन गाऊँ,
तुम पान करो इन अधरों का,मैं प्रेम सुधा रस की बरसाऊँ।।
जब प्रेम सुधा सी सरिता बन तुम,मीलों चल मिलने को आओ,मैं बन रत्नाकर प्रतीक्षारत ,लहर लहर हर छोर लहराऊँ।।
तुम रात विरहिन सी तकती चांद को,बेचैनी मे जब करवट बदलों, मैं बन चाँदनी उसी चाँद की,रश्मियां तुम तक ला बरसाऊँ।।
तुम धधकती प्रेम मे अतृप्त प्यास सी,जब भी मन किलोल करो, मैं बन ज्वाला प्रेम अग्न की,तृप्ति की सब प्यास मिटाऊँ।।
तुम ले अंगडाई, बेचैनी की,सिमटने को आगोश मे आओ,मैं बन टुकड़ा बादल का तुम पर,प्रेम क्षुधा की धार गिराऊँ।।
तुम नर्मी बन जब सख्त हाथों मे मचलने को अशांत रहो,मैं बन विहान सा,घोर अंधकार मे,रोशनी की किरने बरसाऊँ।।
तुम प्रेम की अंतिम बूँद बनो जब,और प्यास को मैं सागर बन जाऊँ,तुम बदरी बन बदरा सी बरसो और मैं फिर अपनी प्यास बुझाऊँ।।
क्या संभव हैं प्रेम प्रीत ये,रीत मीत से मैं रिझ जाऊँ, सरल विरल विरह मे बस मैं,गीत मधुर से ही लिख जाऊँ।।
संदीप शर्मा सरल












