
तुम कहते हो — मैं राख हूँ,
हाँ, मैं राख हूँ…
खाक तो नहीं!
माथे पर लग जाऊँ तो तिलक,
भोले पर चढ़ जाऊँ तो भस्म हूँ,
मैं राख हूँ…
खाक तो नहीं!!
मेरा भी मान है, सम्मान है,
सन्यासियों के गले की माला,
अघोरी बाबा का ताज हूँ,
क्योंकि — मैं राख हूँ…
खाक तो नहीं!
महाकाल का उबटन हूँ,
नागा साधुओं का श्रृंगार हूँ,
मैं राख हूँ…
खाक तो नहीं!!
कहीं भभूति, कहीं पश्चाताप,
कहीं प्रीति, तो कहीं आशीर्वाद हूँ,
मैं राख हूँ…
खाक तो नहीं!
आर. एस. लॉस्टम













