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मुस्कान भी जरूरी है

भोर के आगमन के
साथ नई उमंगों का हीय
में प्रस्थान भी जरूरी है।
रात्रि यदि बीती पलके भीगाने में
तो प्रातः अधरों पर
मुस्कान भी जरूरी है।
शीतलता लिए प्रकृति
जगा रही है,
ठंडे मन मस्तिस्क में साथ
स्वयं को जगाना भी जरूरी है ।
गगन चूमने के सपने जो बुने हों ,
उन सपनों को साकार करने,
जी जन लगाना भी जरूरी है ।
धरती मां की गोद में सुकून ही है
पिता की छांव जैसे ये,
नीला आसमान भी जरूरी है।
रंग बिरंगे फूल फल जैसे
बगिया की शान होती है,
जीवन बगिया महकाने के लिए
प्रेम भरा परिवार जरूरी है।
मातापिता जड़े हैं इस उपवन की
सम्मान और सेवा जल के समान
इनसे, इनके लिए ही हम हैं,
माता पिता के अधरों पर तसल्ली भरी मुस्कान भी जरूरी है ।

श्रीमती अंजना दिलीप दास
बसना महासमुंद

    

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