
महात्मा गाँधी के विचारों की प्राथमिकता सत्य, अहिंसा, स्वराज (स्व-शासन), और सर्वोदय (सभी का कल्याण) थे। उनके दर्शन का मूल उद्देश्य मानव अधिकारों की रक्षा करना, नैतिक और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देना और स्वदेशी व आत्मनिर्भरता के माध्यम से एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करना था। उन्होंने शिक्षा को चरित्र निर्माण और सर्वांगीण विकास का एक शक्तिशाली माध्यम माना था।
सत्य-अहिंसा के सिद्धांत में गाँधी जी का मानना था कि सत्य बोलने के साथ ही सत्य मार्ग पर जीना व चलना आवश्यक है। अहिंसा उनके लिए केवल हिंसा से दूर रहना ही नहीं, बल्कि आत्मबल व सत्य की राह में आत्म-त्याग और नैतिक शक्ति आवश्यक थी।
गाँधी जी के लिए स्वराज का अर्थ राजनीतिक स्वतंत्रता से कहीं बढ़कर था। उनकी यह एक व्यापक अवधारणा थी जिसमें व्यक्ति और राष्ट्र दोनों का आत्म-शासन, आत्म-संयम और आत्म-नियंत्रण शामिल था।
गाँधी जी का सर्वोदय से तात्पर्य यह था कि यह शब्द ही सबकी प्रगति को दर्शाता है। अर्थात् एक ऐसे समाज का निर्माण करना जहाँ सभी वर्ग और व्यक्ति आर्थिक और सामाजिक रूप से समृद्ध हों। सर्वोदय का मतलब सबका कल्याण है।
गाँधीजी ने स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने पर जोर दिया। यह न केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता का मार्ग था, बल्कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एक शक्तिशाली आर्थिक प्रतिरोध भी था। जिसके लिये वह स्वयं चरखा चलाते थे और उसी सूत के बुने वस्त्र पहनते थे जो सबके लिये प्रेरणास्वरूप होता था।
गाँधी जी के शिक्षा दर्शन का मुख्य उद्देश्य युवाओं में नैतिक मूल्यों का विकास करना और उन्हें आदर्श नागरिक बनाना था। उनका मानना था कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य आत्म-मूल्यांकन और सर्वांगीण विकास होना चाहिए।
गाँधीजी ने “सत्याग्रह” के माध्यम से अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने का एक अनूठा तरीका प्रस्तुत किया था। इसमें स्वयं कष्ट सहकर विरोधी के हृदय परिवर्तन की कोशिश की जाती थी।
निष्कर्ष यह है कि गाँधी जी के विचारों की प्रासंगिकता आज भी वैसे ही है जैसे उनके समय थी। खासकर न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाज के निर्माण के लिए उनके विचार दर्शन में विश्व बन्धुत्व, नैतिकता, वैश्विक सद्भाव, मानवीय अधिकारों और निरंतर विकास जैसे मुद्दों के समाधान के लिए एक मजबूत मार्गदर्शिका मौजूद है।
डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ:













