
भवप्रत्ययो विदेह प्रकृतिलयानाम् ।
विदेहप्रकृतिलयानाम्= विदेह और प्रकृतिलय योगियों का {उपर्युक्त योग}; भवप्रत्ययः= भवप्रत्यय कहलाता है ।
अनुवाद– विदेह और प्रकृतिलय योगियों का उपर्युक्त योग ‘भव प्रत्यय’ कहलाता है ।
व्याख्या– ऊपर असम्प्रज्ञात समाधि के दो भेद बताए गए हैं ‘सबीज’ तथा ‘निर्बीज’ । असम्प्रज्ञात सबीज समाधि में चेतन मन की सारी क्रियाएं तो बन्द हो जाती हैं किंतु अचेतन-मन में छिपे पूर्व जन्मों के संस्कार बीज रूप में विद्यमान रहते हैं । इसलिए ऐसे योगी जो सबीज समाधि को तो उपलब्ध हो गए किंतु निर्बीज समाधि उपलब्ध होने से पूर्व ही जिनकी मृत्यु हो गई उनको इन वृत्तियों का बीज शेष रह जाने से पुनः जन्म धारण करना पड़ता है किन्तु उनका यह जन्म अन्तिम होता है । इसमें उनको पूर्व जन्म की उपलब्धियां की स्मृति रहती है तथा इस जन्म में उन्हें कुछ नहीं करना पड़ता । आरम्भ से उन्हें योग साधना की आवश्यकता नहीं होती । वे केवल साक्षी होकर दृष्टावत् देखते हैं ।
वे जीवन में कुछ भी घटे, सब सहन करते हुए चलते हैं तथा प्रतिक्रिया करते ही नहीं । साक्षी बनकर अपने पूर्व जन्म के कर्मों का फल मानकर भोग लेते हैं । वे नए संस्कार निर्मित नहीं करते । इस साक्षी की अग्नि में भी इस बीज को भस्म कर देते हैं जिससे वे निर्बीज समाधि को उपलब्ध हो जाते हैं । पूर्व जन्म में सबीज समाधि को उपलब्ध ऐसे योगी को विदेह कहते हैं । वे प्रकृति लय तक की स्थिति प्राप्त कर चुके होते हैं केवल कैवल्य पद शेष रह जाता है जिसे वे इस जन्म में पूरा करते हैं । उनका यह कैवल्य उपाय जन्य नहीं होने से इसको ‘भव प्रत्यय’ कहते हैं क्योंकि इस समाधि के लिए केवल मनुष्य जन्म लेना ही पर्याप्त है । उन्हें साधन नहीं करना पड़ता । इसलिए वह निर्बीज समाधि भी दो प्रकार से सिद्ध होती है । ‘भव प्रत्यय’ तथा ‘उपाय प्रत्यय’ ।
जिन योगियों की भव प्रत्यय की स्थिति नहीं होती उन्हें उपाय से ही इसे सिद्ध करना पड़ता है ।।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन व प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार












