
उदय काल में लाल था,
अस्त काल भी लाल।
एक रूप ही रवि रहें
सुख-दुख दोनों काल।। १।।
पडती किरणें सूर्य की ,
जल भी हो गया लाल ।।
अस्ताचल को रवि चले
,हो गया संध्याकाल।।२।।
अंशुमाली घर को चले
करके अपना काम।
वृक्षों पर कलरव बढ़ा
क्योंकि हो गयी शाम।।३।।
पंक्तिबद्ध हो खग
सभी ,लौटे अपने नीड
वृक्षों के ऊपर हुई ,
बहुत अधिक अब भीड़।।४।।
तरुणियां सब खिल उठी ,
पिया मिलन की आस।
आने वाले प्रिय मेरे ,
मन में है विश्वास।।५।।
पर्वत के पीछे छुपा,
रक्तिम होकर सूर्य।
अस्त समय भी ना घटा
सूर्यदेव का नूर।।६।।
कभी नहीं घबराइए –
प्रतिदिन रहिए मस्त
सूर्य देव से सीखिए
हर दिन जो होअस्त।।७।।
पुष्पापाठक











