
लिफ़ाफे में बंद प्रेम,
अब सरेआम हो गया।
मन की पीड़ा, तन के कष्ट,
पल भर में उजागर हो गया।
अब चिट्ठी नहीं लिखनी पड़ती,
व्हाट्सएप से काम चलता है,
कुशलक्षेम पूछने को अब
महीनों इंतज़ार नहीं करना पड़ता है।
पर वो दिन कितने अच्छे थे,
जब चिट्ठियों में अपनी ज़ज़्बात,
पूरे हालात लिखते थे—
शुरू होता “प्रिय” से,
और ख़त “चरण-स्पर्श” पर।
जब किसी के नाम चिट्ठी आती,
पूरा गाँव इकट्ठा हो जाता,
एक पढ़ता, बाकी सहमति में सिर हिलाते,
पढ़ने वाला चटकारे से पढ़ता,
सुनने वाले मज़े ले सुनते…
अब ऐसा कुछ नहीं होता—
प्रेम-पत्र लिखने की ज़रूरत नहीं,
व्हाट्सएप पर ही इज़हार होता है।
मान गए तो ठीक,
वरना ब्रेकअप तत्काल होता है।
अब वो तड़प कहाँ,
वो संदेश में मिठास कहाँ,
जब किसी को देखकर
जो सवाल उमड़ते थे—
वो मन की गुदगुदी,
वो मीठा डर… सब खो गया।
उस जलफाफ़े में चाह भी थी,
उत्सुकता भी, थोड़ी घबराहट भी—
पर जैसे भी थे वो दिन…
वो सच में अच्छे थे,
और प्रेम… सच्चे थे।
आर एस लॉस्टम











