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माया

माया की इस नगरी में,
सब माया से दूर है,
माया तो उसके पास है,
जिसके पास “माया” है।

इस दुनिया में सबसे बड़ी,
माया ही तो छाया है,
जिसने पाया माया को,
वो सबसे बड़ा कहाया है।

माया की इस छाया में,
कोई किसी को न पाया,
जिसने पाया माया को,
वो मायापति कहलाया।

माया है तो हम हैं,
नहीं तो हम बेकार हैं,
माया ही तो माया है,
माया ही बस माया है।

माया, तू ऐसी क्यों है,
कि तुझमें है सब समाया,
आज तुझको देखकर,
जीवन भी है शरमाया।

इसलिए तो कहते हैं,
माया ही बस माया है,
माया की इस दुनिया में,
सबको अकेला पाया है।

माया, क्या तूने ये रूप कमाया,
अपने रूप के जादू से,
विश्व पर क्यों राज जमाया।

माया-माया सब करें,
पर माया मिली न राम,
माया-माया, हे माया,
तुझे शत-शत प्रणाम।

आर एस लॉस्टम

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