
जंगल की छाया में, सरल हृदय का एक था वीर,
शस्त्र न था धर्म उसका, बस शिव था उसकी पीर।
न वेदों का ज्ञान, न शास्त्रों की रीति,
भक्ति थी गहराई, और नयन थे प्रीति।
शिकार का मांस लाता, शिवलिंग पर चढ़ाता,
अश्रु से अर्घ्य देता, प्रेम से सजाता।
मुँह का जल समर्पित करता, पवित्रता न जानता,
पर हृदय की सच्चाई से, शिव को पहचानता।
एक दिन देखा — शिवलिंग की आँख से रक्त बहा,
ह्रदय काँप उठा, समर्पण का सागर वहा।
न सोचा, न रोका, बस प्रेम उमड़ा अपार,
निकाली अपनी आँख — चढ़ा दी उस पर वार।
फिर दूसरी आँख भी बहने लगी रक्त धार,
कन्नप्पा ने सोचा — अब दूँ दोनों उपहार।
अँगूठे से टटोलने को रखी अपनी पलक की डोर,
तभी शिव प्रकट हुए — “रुको मेरे चितचोर!”
“तेरी भक्ति से मैं बंध गया, हे मेरे प्रिय बालक,
तू नयन नहीं, हृदय दे चुका — यही है भक्ति का तालक।”
आकाश में गूँजा स्वर — “जय हो कन्नप्पा नयनार!”
भक्ति की धरती पर आज भी, तेरी कथा साकार।
आर एस लॉस्टम













