
कैसा कुठाराघात है विश्वास पर ,
वज्र प्रहार किया तूने प्यास पर ।
विश्वास उठा जहर से भी अब ,
कैसे विश्वास करूॅं सल्फास पर।।
जीवन होता आश्रित खास पर ,
सृष्टि होता आधारित काश पर ।
जीवन करता निखार आस पर ,
अंत अर्पित होता सब लाश पर।।
खाई है बहुत ही कसमें तुमने ,
सारे अपनों के ही जैसे नाश पर ।
कर रहे हो वज्रपात तुम बहुत ,
जन जन के ही हर श्वास पर ।।
भरोसा किया था तुम पे बहुत ,
पर्वत गिर पड़ा है मेरे आस पर ।
चूर चूर हुआ अब यह दिल मेरा ,
खेल खेले हो मेरे एहसास पर ।।
ईश से अधिक भरोसा तुम पर ,
तुझे रहम नहीं आई घास पर ।
कैसे जिऊॅं मैं अब तेरे ही सहारे ,
तुझे तरस न आई मेरे त्रास पर ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार











