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सांच को आंच नहीं

कहते हैं सांच को आंच नहीं
पर यह सच्ची भी बात नहीं

हमने देखें सच्चें सूली चढ़ते
झूठे लोग सदा रहते हैं हंसते

रहता है झूठों का बोलबाला
सच्चों का देखा है मुंह काला

अब सच कहां जग में चलता
सच्चा आदमी ही सदा खलता

जग में होते झूठे के सौ रास्ते
सदा झूठे के लोग गीत गाते

झूठ की आंधी में सच तड़पे
देखो सच कहां आज पनपें

झूठ की राह होती है निराली
सच्चों की कहां होती दीवाली

बताते आपको भी बात पुरानी
मरने पर सच्चों की पढ़े कहानी

              
       सुनील कुमार "खुराना" 
         नकुड़ सहारनपुर 
      उत्तर प्रदेश भारत

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