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दीपावली: अंधकार से प्रकाश की ओर

जग में फैला तम घना, मन भी भय में खोया,
कितने सपने टूट गए, कितनों ने सुख संजोया।
पर देखो आज का ये क्षण, जब दीप जले हज़ार,
अंधियारे से कह रहा, ‘अब बदलो अपना संसार।’

दीप की छोटी लौ कहे, “हर दुख से लड़ जाओ,
कर्म पथ पर चल सदा, सत्य का दीप जलाओ।”
स्वार्थ के परदे तोड़ कर, प्रेम का दीप सजाओ,
नफ़रत की आँधी को रोक, मानवता घर लाओ।

हर घर में जब दीप जले, तो मन भी जगमगाए,
भूला-बिसरा अपनापन, फिर रिश्तों को गले लगाए।
गरीब की चौखट पर भी, उजियारा मुस्काए,
सबके हिस्से में खुशियाँ, दीप शांति का गाए।

सोने-चाँदी की चमक नहीं, सच्चा दीप वही है,
जो करुणा की किरण बनकर, हर हृदय में रही है।
जो बाँटे ज्ञान की मशाल, जो दे उम्मीद का साथ,
वह दीवाली असली है, वह है जीवन की बात।

ऋचा चंद्राकर “तत्वाकांक्षी”
कौंदकेरा महासमुंद

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